गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

वैलेंटाइन डे के आर्थिक दुष्परिणाम

वैलेंटाइन डे के आर्थिक दुष्परिणाम -

'किस लुत्फ़ से झुंझला के वो, कहते हैं शबे-वस्ल,
ज़ालिम ! तेरी आँखों से, गयी नींद कहाँ आज?'
मेरी तरफ़ से एक संशोधित सवाल -

'किस लुत्फ़ से झुंझला के, वो कहते हैं शबे-वस्ल,
कोरी है पासबुक तेरी, बीमा भी नहीं है?'
और
'उस से मिलने की ख़ुशी, बाद में दुख देती है,
जश्न के बाद का, सन्नाटा बहुत खलता है।' (मुईन शादाब)

इस शेर का संशोधित रूप -
'उस से मिलने की खुशी, बाद में दुःख देती है,
चैक बाउंस हुआ, बैंक खबर देती है.'
आखिर में

'ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे,
इक आग का दरिया है, और डूब के जाना है.'

जिगर साहब के शेर का संशोधित संस्करण -
'ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे,
खुद बिक भी गए तो भी, किश्तों को चुकाना है.'

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

नव-बुद्धं शरणम् गच्छामि

तपस्वी सिद्धार्थ को जब -
'दुःख है,
दुःख का कारण है,
दुःख का निदान संभव है,
दुःख-निदान का एक मार्ग है.'

इन चार आर्य सत्यों का ज्ञान हो गया तो वो भगवान बुद्ध बन गए.
मुझको भी कलयुग के चार आर्य सत्यों का ज्ञान हो गया है -
1. दुःख है (अच्छे दिन नहीं आए हैं),
2. दुःख का कारण है (अच्छे दिन न आने का कारण है),
3. दुःख निदान संभव है (अच्छे दिन लाना संभव है),
4. दुःख निदान का एक मार्ग है (अच्छे दिन लाने का मार्ग, 2019 के चुनाव में खोजना संभव है).
अब आप फिर भी मुझे नव-युग का भगवान बुद्ध न मानें और मेरी शरण में आएं तो यह आपकी नादानी होगी.

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

जोश मलिहाबादी

जोश मलिहाबादी -
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एक वर्कशॉप के सिलसिले में वहां 15 दिन रहने का मौक़ा मिला. वहां उर्दू प्रेमियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा. ज़ुबान की मिठास, शायिस्तगी और नफ़ासत में तो वो लखनऊ वालों को भी मात करते थे.
मेरे एक मित्र भाषा और साहित्य में बिल्कुल पैदल थे. उन्हें मेरा खोज-खोज कर उर्दू अदब के दीवानों से गुफ़्तगू करना क़तई पसंद नहीं आता था. दिक्क़त ये थी कि वो हमेशा साए की तरह से मेरे साथ रहते थे. पर मुझे फ़िल्म 'प्यासा' के हीरो, शायर विजय की तरह यह कहने का सौभाग्य कभी हासिल नहीं हुआ-
'हमको अपना साया तक,
अक्सर बेज़ार मिला.'
अलीगढ़ में एक बार मैं अपने मित्र को एक क़व्वाली की महफ़िल में ज़बर्दस्ती ले गया. हबीब पेंटर के एक शागिर्द क़व्वाल ने मेरी शाम को खुशनुमा बना दिया पर मेरे मित्र के लिए वहां तीन घंटे बैठना उम्र क़ैद से कम नहीं था. मुआवज़े के तौर पर अगली शाम मुझे उनकी फ़रमाइश पर उन्हें अभिनय सम्राट जीतेंद्र की एक मारधाड़ वाली फ़िल्म दिखानी पड़ी थी.
एक शाम अलीगढ़ के दोस्तों के साथ शेरो-सुखन की महफ़िल जमी हुई थी. एक मोहतरमा ने 'जोश मलिहाबादी' की एक बहुत ख़ूबसूरत नज़्म सुनाई. दिल खुश हो गया. मैंने उन मोहतरमा के पास जाकर उनकी बहुत तारीफ़ की. फिर बातों का सिलसिला आगे बढ़ा. पता चला कि वो उर्दू विभाग में लेक्चरर हैं और जोश मलिहाबादी पर रिसर्च कर रही हैं.
मैं कुछ कहता पर इस से पहले ही उन मोहतरमा ने मुझसे पूछ लिया -
'सर, आपने क्या जोश मलिहाबादी का नाम सुना है?'
यह सवाल सुनकर मेरे तनबदन में आग लग गयी पर मैंने बड़ी मासूमियत से जवाब देने के बदले एक सवाल दाग दिया -
'मलिहाबाद तो दशहरी आम के लिए दुनिया भर में मशहूर है. ये 'जोश मलिहाबादी' क्या दशहरी आम की कोई क़िस्म है?'
बड़ा ज़ोरदार ठहाका लगा. मेरे मित्र आदतन मेरे साथ थे तो वो भी सबके साथ हँसे फिर वो मिठाइयों की टेबल की तरफ़ मुखातिब हो गए.
मेरे सवाल से परेशान उन मोहतरमा को मैंने बताया कि उन्हीं की तरह मैं भी जोश मलिहाबादी का बहुत बड़ा फैन हूँ और उनकी आत्मकथा 'यादों की बारात' मैंने तीन बार पढ़ी है.
उन मोहतरमा ने मुझसे बाक़ायदा माफ़ी मांग ली पर जोश मलिहाबादी का ये किस्सा वहीं ख़त्म नहीं हुआ.
मेरे परम मित्र ने हमारे अलीगढ़ प्रवास के कुछ दिन बाद मुझसे पूछा -
जैसवाल साहब, आप जून, जुलाई में क्या लखनऊ जाएँगे?'
मैंने जवाब देते हुए एक सवाल भी कर दिया -
'लखनऊ तो मेरा घर है. फिर दशहरी आम का सीज़न हो और मैं वहां न जाऊं, क्या ऐसा कभी हो सकता है?'
मित्र बोले - 'आप से एक रिक्वेस्ट है.'
मैंने कहा - 'मित्र, निसंकोच कहो.
मित्र ने कहा - 'लखनऊ से हमारे लिए एक पेटी, नहीं तो कम से कम 5 किलो 'जोश मलिहाबादी' लेते आइएगा.'

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

पहले आत्महत्या और अब ख़ुदकुशी




पहले आत्महत्या और अब ख़ुदकुशी -

राजीव गाँधी के शासन काल में सरकारी रिकॉर्ड की सुई हर बार नाना जी और मम्मी जी की दास्तान पर अटक जाती थी.  इस से क्षुब्ध होकर मैंने कुछ पंक्तियाँ कही थीं-

मम्मी ने ये किया था,
वो कर गए थे नाना,
कब तक सुना करेंगे,
किस्सा वही पुराना.
पुरखों की आरती में,
मुर्दों की दास्ताँ में,
मसरूफ़ हो रुके हम,
पर बढ़ गया ज़माना.’

आज हम भारत के जगदगुरु होने का दंभ भरते हुए अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेज रहे हैं और स्वदेशी का राग अलापते हुए मल्टी नेशनल कंपनियों को,  विदेशी पूंजीपतियों को भारत के बाज़ार को लूटने की खुली छूट दे रहे हैं. हम वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाते हुए, देश को एकसूत्र में बाँधने का दावा करते हुए, देश के, और समाज के, उसी कुशलता से टुकड़े कर रहे हैं जैसे कि कोई पारंगत हलवाई थाल में सजाकर बर्फ़ी के टुकड़े करता है

भारत की एकता का,
नाटक सुखान्त होगा.
हर प्रांत, देश होगा,
हर क़स्बा, प्रान्त होगा.

और अंत में – हमसे जलने वाले प्रेमचंद के होरी जैसे किसानों की आत्महत्या की दुहाई देकर हमको अपनी उपलब्धियों का गुणगान करने से रोकना चाहते हैं, हमको उत्सवों का आयोजन करने से रोकना चाहते हैं. पर हम क्या उनके रोके रुकेंगे? कभी नहीं –

ख़ुदकुशी होरी करे,
उत्सव मनाते जाएंगे,
हम रसातल तक प्रगति के,
गीत गाते जाएंगे.

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

वह तोड़ती पत्थर

'वह तोड़ती पत्थर,
इलाहाबाद के पथ पर'

निराला जी की कविता पढ़कर क्या नेहरु जी ने कभी यह कहा था? -

'देखिए, हमने लाखों बेरोज़गार औरतों को पत्थर तोड़ने का काम दिलवा दिया है.'

वैसे बेरोज़गारी की समस्या हमारे देश में कभी रही ही नहीं है. जो महिला नेहरु जी के ज़माने में पत्थर तोड़ती थी, आज उसका पर-पोता पकौड़े बेच रहा है.

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

जश्न-ए-मातम


राजीव गाँधी के शासनकाल में लिखी गयी मेरी यह कविता आज के शहीदों की विधवाओं को समर्पित है -

जश्न-ए-मातम -

अरे मृतक की बेवा तुझको, इस अवसर पर लाख बधाई !

अखबारों में चित्र छपेंगे, पत्रों से घर भर जाएगा,
मंत्री स्वयम् सांत्वना देने, आज तिहारे घर आएगा।
सरकारी उपहार मिलेंगे, भाग्य कमल भी खिल जाएगा,
पिता गए हैं स्वर्ग जानकर, पुत्र गर्व से मुस्काएगा।।

विधवा ! रोती इसीलिए क्या, तेरी माँग उजड़ जाएगी?
जल्दी ही सूने माथे की, तुझको आदत पड़ जाएगी।
यह उदार सरकार, दया के बादल तुझ पर बरसाएगी,
थैली भर रुपयों के बदले, तेरी बिंदिया ले जाएगी।।

छाती पीट रही क्यों पगली, अभी कर्ज़ यम के बाकी हैं,
यहाँ मौत का जाम पिलाने पर आमादा, सब साक़ी हैं।
बकरों की माँ खैर मना ले, यहाँ भेड़िये छुपे हुए हैं,
कुछ ख़ूनी जामा पहने हैं, पर कुछ के कपड़े ख़ाकी हैं।।

मृत्यु सभी की अटल सत्य है, फिर क्यों छलनी तेरा सीना?
बाट जोहने की पीड़ा से मुक्ति मिली, क्यों आँसू पीना?
बच्चों की किलकारी का कोलाहल भी अब कष्ट न देगा,
शांत, सुखद, श्मशान-महीषी, बन, आजीवन सुख से जीना।।

अरे मृतक की बेवा तुझको, इस अवसर पर लाख बधाई,
आम सुहागन से तू, बेवा ख़ास हुई है, तुझे बधाई।।

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

नया बजट

नया बजट -
25 साल पहले श्री मनमोहन सिंह के बजट पर मेरी टिप्पणी थी -
'भिक्षाटन उद्योग बनेगा, सबको रोज़ी दिलवाएगा,
नए बजट में हर बन्दे को, एक कटोरा मिल जाएगा.' 


लेकिन अब जेटली जी ने तो वो कटोरा भी हमसे छीन लिया है .

भला हो मोदी जी का, जो हर बेरोज़गार नौजवान को पकौड़े तलने के लिए एक-एक कढ़ाही देने वाले हैं.

'नौजवानों की हो गयी चांदी,
क्यों खपायें वो सर, पढ़ाई में,
धन की बारिश हुई, पकौड़े तल,
उँगलियाँ घी में, सर कढ़ाई में.'

मोमिन के अंदाज़ में एक बूढ़े पकौड़ी वाले के दिली जज़्बात -
उम्र सारी तो कटी अपनी, पकौड़े तलकर,
आख़िरी वक़्त में, मशहूर हुए, दुनिया में.