शनिवार, 11 नवंबर 2017

अनार की कली



अनार की कली -
कौए की चोंच में अनार की कली वाली मसल हमने सुनी तो थी पर उसका साक्षात्कार करने का अवसर बहुत बाद में मिला था.
लखनऊ की एक पौश कॉलोनी में एक शानदार बंगले में किराएदार के रूप में शर्मा दंपत्ति रहता था. हमारे डॉक्टर शर्मा शक्ल सूरत के ठीक ठाक से किन्तु वज्र देहाती किस्म के प्राणी थे और श्रीमती शर्मा फ़ेमिना मिस इंडिया टाइप होश उड़ाऊ शक्शियत थीं. डॉक्टर शर्मा थे तो एक गरीब ब्राह्मण परिवार के पर पढ़ने में बहुत अच्छे थे. एम. एससी. में टॉप करते ही वो लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हो गए थे. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जाने माने वकील सुकुल साहब को हमारे डॉक्टर शर्मा अपनी स्मार्ट बिटिया के लिए पसंद आ गए.
सुकुल साहब का मानना था कि इन्सान को अपनी जड़ और ज़मीन से हमेशा जुड़ा रहना चाहिए. उन्होंने इलाहाबाद में रहते हुए भी अपने गाँव के लोगों से और अपनी पुश्तैनी जागीर से खुद को जोड़कर रक्खा था. अपनी श्रीमती जी से सुकुल साहब पुरबिया बोली में ही संभाषण करते थे. ये बात दूसरी है कि उनकी अमेरिका रिटर्न बिटिया अगर हिंदी भी बोलती थीं तो उसमें आधे से ज़्यादा शब्द अंग्रेज़ी के होते थे.
सुकुल जी की बिटिया को डॉक्टर शर्मा बिलकुल पसंद नहीं आए थे किन्तु पिताश्री की दलीलों ने उन पर जादू का असर किया और फिर इस बेमेल विवाह के संपन्न होने में कोई बाधा नहीं रह गयी.
सुकुल साहब लम्बी चौड़ी हवाई जहाजनुमा गाड़ी में सवार होकर जब रिश्ता पक्का करने के लिए डॉक्टर शर्मा के गाँव पहुँचे तो उनके पिताजी अपने होने वाले समधी की शानो-शौकत देखकर सकते में आ गए. पिताश्री के साथ परम घाघ फूफाश्री भी थे जो कि सुकुल जी के वैभव से उतने प्रभावित नहीं लग रहे थे उन्होंने सुकुल जी के कान में कहा -
'वकील साहब आपसे शिमला के नर्सिंग होम के बारे में कुछ प्राइवेट में बात करनी है. ज़रा बाहर आइएगा.’
सुकुल जी इत्मीनान से बाहर आए फिर फूफाश्री को संबोधित करके कहने लगे –
‘हमारे होने वाले जमाई राजा के फूफाजी, आपकी बात सुनने से पहले हम अपनी एक बात कहेंगे. हमारे यहाँ लड़के के बाद सबसे ज़्यादा इज़्ज़त लड़के के फूफा को दी जाती है. आइए पहले गले मिलते हैं.’
इतना कहकर सुकुल जी ने अपने गले में पड़ी सोने की मोटी चेन फूफाश्री के गले में डाल दी फिर मुस्कुराते हुए बोले –
‘हाँ तो आप किसी नर्सिंग होम के बारे में कुछ प्राइवेट में बात करना चाह रहे थे. फ़रमाइए क्या कहना चाहते हैं?’
फूफाश्री अपने गले में पड़ी सोने की चेन को घुमाते हुए बोले –
‘समधी जी, छोडिए ये सब इधर-उधर की बातें. अब तो आपकी बिटिया हमारी हुई. हाँ, जैसे आपने लड़के के फूफा को सम्मान दिया है वैसा ही सम्मान आप लड़के की बुआ को दीजिएगा. बस, मुझे यही कहना है.’
सुकुल जी ने जवाब दिया -
‘अब लड़के की बुआ तो आई नहीं हैं. आप से प्रार्थना है कि नेग के ये इक्कीस हज़ार रूपये मेरी ओर से आप उनकी सेवा में प्रस्तुत कर दें.’
फूफाश्री ने अपनी ओर से रिश्ता पक्का होने पर अपनी मुहर लगा दी और अपने साले साहब को इशारा कर दिया कि वो मुंह खोल कर सुकुल जी से दहेज मांग लें.
अपने जीजा जी के इशारे पर पिताश्री ने अपनी समझ से दहेज की एक अकल्पनीय डिमांड सुकुल जी के सामने रख दी. सुकुल जी होने वाले समधी जी की डिमांड सुनकर कुछ देर तक सोचते रहे फिर मुस्कुराकर बोले –
‘पंडित जी, आप जितनी रकम दहेज में मांग रहे हैं उस से ज़्यादा तो मैं आपको टीके की रस्म में ही दे दूंगा.’
शाही अंदाज़ में हमारे शर्मा बन्धु की शादी हुई और एक ट्रक भर के दहेज का सामान लेकर शर्मा दंपत्ति ने लखनऊ के अपने किराये के बंगले में प्रवेश किया.
डॉक्टर शर्मा के बंगले का किराया ठीक उतना था जितनी कि उनकी तनख्वाह. दहेज में श्रीमती शर्मा अपने साथ अपनी वो नौकरानी भी लाई थीं जो कि उनके बचपन से ही उनकी सेवा करती आई थी. घर खर्च कैसे चलेगा, इसकी चिंता डॉक्टर शर्मा को नहीं करनी थी. सुकुल साहब ने बिटिया के नाम इतना पैसा फिक्स्ड डिपाजिट में डाल दिया था कि उसके मासिक ब्याज से ही उसके सारे शौक़ और ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं.
हालांकि डॉक्टर शर्मा ने उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय से और श्रीमती शर्मा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी लेकिन डॉक्टर शर्मा के दुष्ट विद्यार्थी उन दोनों को क्रमशः ‘गुरुकुल कांगड़ी’ और ‘मिरांडा हाउस’ कहकर पुकारते थे.
श्रीमती शर्मा पंद्रह दिन में एक बार इलाहाबाद का चक्कर ज़रूर लगाती थीं और इस यात्रा के लिए वो हर बार टैक्सी बुलवा लेती थीं. डॉक्टर शर्मा जी टैक्सी का बिल तो नहीं भरना होता था पर अपनी श्रीमती जी की ऐसी यात्राओं का खर्चा सुनकर ही उनको चक्कर आ जाता था. श्रीमती शर्मा अपने भतीजे पर जान छिड़कती थीं. दो-चार बार डॉक्टर शर्मा भी उनके साथ इलाहाबाद गए थे. उन्होंने नोटिस किया कि उनकी सलहज अपने बेटे से उखड़ी-उखड़ी रहती थीं जब कि उनकी श्रीमती जी उसे अपने कलेजे से लगाए रखती थीं.
श्रीमती शर्मा को अब डॉक्टर शर्मा के मग्घेपन की आदत पड़ गयी थी और डॉक्टर शर्मा ने भी अपनी मेमनुमा श्रीमती जी के नखडों के साथ एडजस्ट करना सीख लिया था. डॉक्टर शर्मा को अपने फूहड़पन पर अपनी श्रीमती जी की झिड़की खाने का अभ्यास हो गया था और दूसरी तरफ पतिदेव के सुड़-सुड़ कर के चाय पीने पर और हाथ से सड़प-सड़प कर दाल-भात खाने पर अब श्रीमती शर्मा को भी कोई ख़ास आपत्ति नहीं होती थी.
अब उनके घर में नन्हा मेहमान आने वाला था. कुछ समय बाद श्रीमती शर्मा ने एक सुन्दर से नौनिहाल को जन्म दिया. शर्मा दंपत्ति का बंगला एक बार फिर उपहारों से भर गया और बंगले के गैरेज में एक कार भी खड़ी हो गयी. फूफाश्री और बुआ जी को इस बार भी भरपूर नेग मिले.
अपनी कार के आते ही श्रीमती शर्मा के इलाहाबाद के चक्कर और बढ़ गए. अब वो अपने नौनिहाल और अपनी नौकरानी को साथ लेकर ख़ुद कार ड्राइव करती हुई इलाहाबाद तक की यात्रा करने लगी थीं.
दिन चैन से गुज़र रहे थे. एक बार श्रीमती शर्मा फिर इलाहाबाद गईं थीं कि इलाहाबाद से ही उनकी भाभी यानी कि डॉक्टर शर्मा की सलहज का फ़ोन आया. फ़ोन पर बड़े रूखे से अंदाज़ में उन्होंने अपने नन्दोई जी को इलाहाबाद पहुँचने का आदेश दे डाला. डॉक्टर शर्मा को जब सलहज साहिबा ने यह बताया कि उन्होंने उनके पिताश्री और उनके फूफाश्री को भी इलाहाबाद तलब किया है तो उनके पांवों तले ज़मीन ही खिसक गयी.
डॉक्टर शर्मा बेचारे अगली ट्रेन पकड़कर इलाहाबाद पहुँचे. उनके पिताश्री और उनके फूफाश्री पहले ही सुकुल जी के बंगले में मौजूद थे. पिताश्री ने सपूत को देखा तो वो उन पर टूट पड़े.
‘जोरू के गुलाम डुबो दिया हमारे कुल का नाम? ऐसी कलंकिनी बहू लेकर आया है जो शादी से पहले ही एक बच्चे की माँ थी.’
फूफाश्री भी डॉक्टर शर्मा से ताना मारते हुए बोले -
‘बर्खुरदार, शिमला के नर्सिंग होम का किस्सा हमने पहले भी सुना था पर आज उस पर तुम्हारी सलहज ने सच की मुहर लगा दी.’
डॉक्टर शर्मा जब तक मुंह खोलें तब तक उनकी सलहज साहिबा आ धमकीं और गरज कर बोलीं -
‘जीजाजी, अब मैं किसी के पाप को अपना बेटा नहीं कहूँगी.
अपनी मेम साहब का पहला बेटा आपको मुबारक हो. अब इस बच्चे को भी आप अपने साथ लखनऊ ले जाइए.’
पिताश्री और फूफाश्री की गालियाँ खाकर डॉक्टर शर्मा पहले ही आहत हो चुके थे और उस पर सलहज साहिबा के तानों ने उनकी बेईज्ज़ती की रही सही कसर भी पूरी कर दी.
सबसे अचरज की बात यह थी कि अपने ही घर में सुकुल जी पूर्णतया निर्विकार होकर इस नौटंकी को देख रहे थे पर फिर वो एकदम से पिताश्री और फूफाश्री की तरफ़ मुख़ातिब हुए और बड़ी सख्ती से उन से बोले -
‘समधी साहिबान, आप सबकी बकवास मैंने सुन ली. अब चुपचाप बैठकर आप मेरी बात सुनिए.
आपको क्या लगता था कि आपके कौए जैसे सपूत की चोंच में अपनी अनार की कली जैसी बिटिया मैंने यूँ ही पकड़ा दी थी? आप लोगों के कच्चे घरों में इतना पक्का दहेज क्या मैंने यूँ ही भर दिया था? अगर शिमला के नर्सिंग होम वाली बात नहीं होती तो रिश्तेदारी की बात तो दूर, आप लोगों को मैं अपने बंगले में घुसने भी नहीं देता.’
फूफाश्री ने विनम्रता से कहा –
‘समधी जी, नाराज़ मत होइए. आइए प्राइवेट में कुछ बात करते हैं.’
सुकुल जी दहाड़े –
‘अब प्राइवेट में बात करने के दिन लद गए. आज से तुम लालची फटीचरों से मेरी रिश्तेदारी भी ख़तम. आज जब कि मेरे नाती की बात खुलकर सामने आ चुकी है तो फिर आज से तुम लोगों को हड्डी डालना भी बंद.’
पिताश्री ने सुकुल जी से हाथ जोड़कर कहा –
‘समधी जी इतना नाराज़ होना अच्छी बात नहीं है. हमारे जीजाजी ठीक कह रहे हैं. हम सब प्राइवेट में बैठकर मामला निबटा लेते हैं.’
सुकुल जी ने फिर सख्ती से कहा –
‘मेरे बहुत से मुवक्किल पेशेवर क़ातिल हैं. मेरे एक इशारे पर वो किसी का पूरा खानदान साफ़ कर सकते हैं. अब आप लोगों ने मेरी बिटिया के बारे में दुबारा अपनी चोंच खोली तो अपने अंजाम के बारे में सोच लीजिएगा. मैं अपनी बहू को भी उसकी गुस्ताखी सज़ा देता पर क्या करूँ? वो हमारे घर के चिराग को जन्म देने वाली है.
और हाँ, जाते जाते यह भी सुन लीजिए, अब आप लोग मेरे जमाई से भी मिलने की कोशिश मत कीजिएगा. मैंने उसे पूरी तरह ख़रीदने का पक्का इंतज़ाम कर लिया है.’
अगले क्षण पिताश्री और फूफाश्री सुकुल जी के बंगले से बाहर जा चुके थे.
जमाई राजा अपने पिताश्री और अपने फूफाश्री की बेईज्ज़ती होते हुए देख रहे थे पर ख़ुद को कौआ कहे जाने पर और अपने खरीदे जाने की बात सुनकर उनका खून खौल गया था लेकिन ससुरजी से अकड़कर बात करने की उनकी फिर भी हिम्मत नहीं हुई. उन्होंने मिमियाते हुए सुकुल जी से कहा -
‘पापा, आपने पिताजी और फूफाजी की इतनी बेईज्ज़ती की, मैंने चुपचाप सह लिया आपकी बेटी की नर्सिंग होम वाली बात भी मुझे बर्दाश्त हो गयी पर आपने मुझे जो कौआ कहा है और मुझे जो ख़रीदने की बात कही है उस से मेरा दिल बहुत दुखा है.’
सुकुल जी ने शांत होकर डॉक्टर शर्मा से कहा -
‘तुम्हारे बाप, फूफा और तुम्हारी इज़्ज़त तो टका सेर बिकती है. मेरी बात सुनकर तुम्हारा दिल कभी नहीं दुखेगा, इसकी गारंटी है. पहले ज़रा अपने ख़रीदे जाने की कीमत तो सुन लो.
मैंने लखनऊ में एक आलीशान बंगला बिटिया के लिए खरीद लिया है और तुम्हारे लिए हर महीने पच्चीस हज़ार का पॉकेट मनी फ़िक्स कर दिया है. अपनी तनख्वाह भी तुम अपने पास ही रखना. घर का खर्च चलाने की न तो तुम्हारी औक़ात है और न ही उसकी तुम्हें कोई ज़रुरत है. पर इन सब मेहरबानियों की शर्त ये है कि तुम मेरे बड़े नाती को अपना बेटा बना कर अपने साथ रक्खोगे, मेरे दोनों नातियों को एक सा प्यार दोगे और मेरी बिटिया को ख़ुश रक्खोगे. और हाँ, अपने घर वालों से अब तुम कोई सम्बन्ध नहीं रक्खोगे. अगर मेरी शर्तें तुम्हें मंज़ूर नहीं हैं तो रास्ता नापो.’
सुकुल जी के इस बेहूदे प्रस्ताव को सुनकर डॉक्टर शर्मा को इतना गुस्सा आया, इतना गुस्सा आया कि उन्होंने लपक कर उनके चरण पकड़ लिए.
उसी दिन शर्मा परिवार ने ढेरों उपहार के साथ लखनऊ के लिए प्रस्थान किया.
शर्मा दंपत्ति अपने लखनऊ वाले नए बंगले में अब अपने दोनों बेटों के साथ सुख और शांति से रह रहा है. डॉक्टर शर्मा की अपनी एक खुद की कार भी उनके नए बंगले में आ गयी है और सबसे सुखद समाचार यह है कि उन्होंने बिना सुड़-सुड़ कर के चाय पीना और बिना सपड़-सपड़ कर दाल-भात खाना भी सीख लिया है. 

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

मकबरो ऐ

मकबरो ऐ -
ये किस्सा मेरे जन्म से पहले का है. हमारी एक चाची ताजमहल के निकट ताजगंज की रहने वाली थीं. जब चाचाजी और चाची का रिश्ता तय हुआ तब पिताजी की पोस्टिंग आगरा में ही थी.
एक बार माँ, पिताजी, मेरे भाइयों और बहन के साथ चाची के मायके ताजगंज गए. नानी जी अर्थात चाची की माताजी ने अतिथियों का भव्य स्वागत किया. बातचीत के दौरान माँ ने उनसे पूछा -
'मौसी, आपके घर से तो ताजमहल साफ़ दिखाई देता है. आपलोग तो रोज़ाना घूमते-घूमते ताजमहल चले जाते होंगे?'
नानीजी ने जवाब दिया -
'जे ताजमहल मरो इत्तो ऊँचो ऐ कि जा पे नजर तो पड़ई जात ऐ.'
(ये कमबख्त ताजमहल इतना ऊंचा है कि इसपर नज़र तो पड़ ही जाती है.)
माँ ने नानी से पूछा - 'आप कितनी बार ताजमहल गयी हैं?'
नानी ने जवाब दिया - 'ए लली, जे तो मकबरो ऐ, बा में जाय के कौन अपबित्तर होय?'
(बिटिया, ये तो मकबरा है, उसमें जाकर कौन अपवित्र हो?)
फिर नानी ने माँ-पिताजी से पूछा -
तुम लोग का मंदिरजी होयके आय रए ओ?
(तुम लोग क्या मंदिर जी होकर आ रहे हो?)
पिताजी ने जवाब दिया -'नहीं मंदिरजी होकर नहीं, हम तो ताजमहल घूमकर आ रहे हैं.'
नानी जी ने माँ-पिताजी का लिहाज़ किए बिना दहाड़ कर अपनी बहू को आवाज़ लगाई - 'बऊ ! महरी ते कै कि मेहमानन के बर्तन आग में डाल के मांजे'
(बहू, मेहरी से कह कि मेहमानों के बर्तन आग में डाल कर मांजे)

इतना कहकर नानी जी भनभनाती हुई दुबारा स्नान करने को चली गईं.
काश कि नानी जी ने पी. एन. ओक साहब और आज के देशभक्तों के विचारों को पढ़ा होता तो फिर वो ताजमहल को मकबरा नहीं, बल्कि मंदिर मानतीं और माँ-पिताजी पर वो इतना गुस्सा भी नहीं करतीं.

रविवार, 5 नवंबर 2017

आज़ादी का मोल



आज़ादी का मोल

                नेहा एक नन्हीं सी, प्यारी सी पर बड़ी जि़द्दी लड़की थी। उसकी रोज़ाना की फ़रमाइशों को पूरा करते-करते उसके मम्मी-पापा थक गए थे मगर उसकी फ़रमाइशें तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थीं। अगर मम्मी-पापा फ़ौरन उसकी फ़रमाइश पूरी नहीं करते तो वह आसमान सर पर उठा लेती थी। पचासों तरह के खिलौनों,  गुडियों,  कम्प्यूटर गेम्स और न जाने क्या-क्या अटरम-शटरम चीज़ों से भरा उसका कमरा पूरा अजायबघर मालूम पड़ता था। किसी की क्या मजाल जो उसके किसी भी सामान को हाथ लगा सके। हाँ, अगर खुद उसका मन किसी चीज़ से भर जाए तो उसे कूड़े के ढेर में फेंकते हुए उसे एक सेकिण्ड भी नहीं लगता था।
                एक रविवार की सुबह नेहा अपने पापा के साथ बोटैनिकल गार्डेन में घूम रही थी। पेड़-पौधों के बीच पत्थर की पगडंडियों पर दौड़ लगाना उसे बहुत अच्छा लग रहा था। फूलों पर मँडराती तितलियाँ और पेड़ों पर चहकती चिड़िया उसे बहुत भा रही थीं । हरे-हरे तोते और काली-काली मैनाओं की इंसान जैसी बोलियों ने तो उसका दिल ही जीत लिया था । उसने अपने पापा से पूछा- 
पापा! क्या यह सच है कि तोते और मैना हमारी बोली बोल सकते हैं?“
उसके पापा ने जवाब दिया-
बिलकुल हमारी तरह से तो नहीं पर अगर उन्हें सिखाया जाय तो उनकी काफ़ी बातें हमारी समझ में आ सकती हैं।
                नेहा के पापा ने ऐसा कह कर अपनी जान आफ़त में डाल ली। अब नेहा जि़द पकड़ कर बैठ गई कि उसे एक तोता और एक मैना अपने घर में चाहिए ही चाहिए। उसके पापा ने उसे लाख समझाया पर वह अपनी जि़द से टस से मस नहीं हुई। नेहा की मम्मी ने उससे कहा-
नेहा! पंछी तो खुले आकाश में ही अच्छे लगते हैं। तोते और मैना को पिंजड़े में कैद करके तुम क्यों उनकी आज़ादी छीनना चाहती हो?“
नेहा के पास मम्मी के सवाल का जवाब तैयार था-
मम्मी! मैंने पढ़ा है कि सुबह से शाम तक मेहनत करने बाद भी दो-चार दाने ही जुटा पाते हैं ये बेचारे पंछी। मैं इनको पालूंगी तो इनको अच्छे से अच्छा खाने को दूंगी,  इनको बढि़या पिंजड़े में रक्खूंगी। इन्हें किसी चील-कौए या किसी बिल्ली से खतरा भी नहीं होगा। इन्हें गर्मी लगेगी तो ए. सी. चला दूँगी और अगर सर्दी लगी तो हीटर ऑन कर दूंगी।
                नेहा की मम्मी ने कहा-
बेटी ! इन पंछियों को तुम्हारे पकवानों और ए. सी.-हीटर की कोई ज़रूरत नहीं है। इनको तो बस खुले आकाश में अपने साथियों का साथ और पेड़ों पर अपना बसेरा चाहिए।
                नेहा की मम्मी की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि मेन गेट पर एक बहेलिया पंछी बेचता हुआ आ गया। नेहा की तो मानो लाटरी खुल गई। बहेलिये के पास एक से एक सुन्दर तोते और मैनाएं थीं। अब तो हर हाल में नेहा को पंछी चाहिए ही थे। रोने-धोने से काम नहीं बना तो भूख-हड़ताल का सहारा लेकर उसने अपनी जि़द पूरी करवा ही ली। बहेलिये को दो सौ रुपये देकर नेहा की मम्मी ने उसके लिए एक तोता और एक मैना खरीद ही लिए। बड़े ज़ोर-शोर के साथ दोनों पंछियों के लिए एक-एक सुन्दर पिंजड़ा  खरीदा गया,  उनमें अच्छा सा बिछौना बिछाया गया और खाने-पीने का सब इंतज़ाम भी किया गया। नेहा तो अपना सारा खाली समय इन दोनों पंछियों की सेवा में लगाने लगी थी। उसने तोते का नाम मिठ्ठू और मैना का नाम मिन्नी रक्खा था। उसको इन दोनों पंछियों के बोलने का इंतज़ार था। वह रोज़ाना सुबह-शाम उन्हें छोटे-छोटे शब्द सिखाने की कोशिश करती थी। दस दिनों की लगातार कोशिश के बाद भी दोनों पंछी अपना नाम दोहराना नहीं सीख पाए तो नेहा को गुस्सा आने लगा। उसने अपने पापा से कहा-
पापा ! उस चिड़िये वाले से दूसरे पंछी खरीद कर लाइए। ये पंछी तो हमारी जैसी बोली नहीं सीख पा रहे हैं,  न गाना गाना,  बस, टें-टें करते रहते हैं। ये दिन-भर बैठे-बैठे खाते रहते हैं,  बढ़िया बिछौनों पर सोते हैं,  कूलर की हवा के मज़े लूटते हैं पर फिर भी हमेशा उदास-उदास रहते हैं।
                नेहा के पापा ने कहा-
तुमने उनकी आज़ादी छीन ली और अब मुठ्ठी भर दानों और थोड़े आराम के बदले तुम उनका गाना सुनना चाहती हो। क्या तुम एक दिन के लिए भी अपने घर में ही कैद रहकर खुशी से गाना गा सकती हो?“
                नेहा ने कहा-
क्यों नहीं? आप मेरे लिए अच्छा-अच्छा खाना और मेरे सारे खिलौने मेरे पास छोड़ दीजिए फिर देखिए मैं खुश रहती हूं कि नहीं?“
                नेहा के पापा ने कहा-
ठीक है! मैं और तुम्हारी मम्मी कल दोपहर एक शादी में जा रहे हैं। तुम्हारे लिए तरह-तरह के पकवान होंगे,  तुम्हारे खिलौने होंगे,  देखने के लिए टीवी होगा और कम्पनी के लिए तुम्हारे ये प्यारे पंछी भी तुम्हारे पास होंगे। बस! तुमको आठ घण्टों के लिए अकेले घर में कैद रहना होगा। अगर तुम खुश-खुश रह लोगी तो इन पंछियों के बदले तुम्हारे लिए दूसरे पंछी ले आएंगे।
                नेहा ने पापा की चुनौती स्वीकार कर ली। मम्मी-पापा उसे अकेला छोड़कर चले गए। नेहा ने मज़े ले-लेकर कार्टून चैनल पर मिकी-डोनाल्ड की फि़ल्म देखी। फि़ल्म देखने से मन भर गया तो फिर उसने कुछ देर कंप्यूटर गेम्स से मन बहलाया। कुछ देर तक मम्मी के बनाए पकवानों का भी मज़ा लिया। न कोई टोकने वाला था न कोई उपदेश देने वाला फिर भी न जाने क्यों उसे आनन्द नहीं आ रहा था। आज उसका मन पंछियों को अपनी बोली और गाना सिखाने का भी नहीं हो रहा था। खिलौनों को तो देखने का भी मन नहीं हो रहा था। सांय-सांय करता हुआ खाली घर उसे बड़ा डरावना लग रहा था। इतने बड़े घर में अकेली लड़की छोड़कर मम्मी-पापा ने अच्छा नहीं किया था। नेहा ने मम्मी-पापा को जितनी बार भी फ़ोन लगाया तो वो स्विच ऑफ़ निकला. चार घंटे अकेले रहकर नेहा रानी को अपना ही घर कैदखाना लगने लगा। आठ घण्टे की कैद का समय पूरा होते-होते तो नेहा रानी घबरा कर रोने लगीं। उनके रुदनगान के साथ-साथ उनके पालतू पंछियों की टें-टें बड़ी मीठी लग रही थी। मम्मी-पापा जब घर लौटे तो नेहा दौड़कर उनके पैरों से लिपट गई। वह रोते हुए उनसे बोली-
मम्मी-पापा! आप दोनों बहुत गन्दे हैं। आपने अपनी इत्ती सी नेहा गुडि़या को इतने बड़े घर में अकेले कैद कर दिया।
नेहा के पापा ने उससे पूछा-
क्यों बेटी! तुम्हारे पास तो तुम्हारी आज़ादी के अलावा सब कुछ था। तुम्हें तो खुशी से गाने गाने चाहिए थे फिर तुम रो क्यों रही हो?“
                नेहा ने नाराज़ होकर कहा-
कैद में रहकर भला कोई खुशी से गाना गा सकता है?“
नेहा के पापा ने मुस्कुरा कर कहा-
क्यों नहीं? तुम भी तो अपने पंछियों को कैद करके उन्हें खाना-पीना और तरह-तरह के आराम देकर उनसे गाना गवाना चाहती हो। हमने भी तो तुम्हारे साथ यही किया था फिर तुमने खुश होकर गाना क्यों नहीं गाया?“
नेहा अपने पापा का इशारा समझ गई। उसने चुपचाप आगे बढकर पंछियों के पिंजड़े खोलकर उन्हें आज़ाद कर दिया। नेहा को आज़ादी का मोल समझ में आ गया था।

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

सती -



सती
                 बंगाल प्रान्त के बर्दवान जिले के राधानगर गांव में एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार का एक बालक, राममोहन बहुत दुखी था। उसके बड़े भाई की अचानक ही मृत्यु हो गई थी। घर में शोक का वातावरण था पर एक ओर शोर भी था। कुछ महिलाएं ऊँचे स्वर में किसी को भला-बुरा कह रही थीं। राममोहन के कानों में कुछ ऐसी बातें पड़ रही थीं-
अभागी! आते ही पति को खा गई। यह तो हमारे कुल का सर्वनाश कर देगी। वहीं चली जाए जहां इसने हमारा बेटा भेज दिया है। इसके सती होने में ही परिवार और समाज का भला है। इसे सती होना चाहिए! इसे सती हो जाना चाहिए! बोलो सती मैया की जय !
                राममोहन ने देखा कि अभी-अभी विधवा हुई उसकी भाभी को घेर कर महिलाएं यह सब कह रही हैं। भाभी को भला-बुरा कहते-कहते अचानक सती मैया का जय-जयकार क्यों होने लगा,  यह नन्हे राममोहन के समझ में बिल्कुल नहीं आया। उसने अपनी माता श्रीमती फूल थाकुरानी से इन बातों का कारण पूछा तो उन्होंने अपने आंसू पोंछते हुए उसे बताया -
तेरी भाभी के दुर्भाग्य से हमारा बेटा हमको छोड़कर भगवान के पास चला गया है। यह अभागी विधवा हो गई है। इसका घर में रहना इसके लिए और सारे परिवार के लिए अशुभ होगा। पर हां,  अगर यह सती हो जाती है तो इसे स्वर्ग मिलेगा और हमारे कुल का नाम भी समाज में ऊँचा होगा।
राममोहन ने फिर पूछा -
माँ! सती किसे कहते हैं?  मेरी भाभी सती कैसे होंगी?
राममोहन की माँ ने उत्तर दिया – 
जो स्त्री अपने पति को अपना भगवान मानती हो और उसके बिना जीवित रहने को तैयार न हो वह सती कहलाती है। तेरी भाभी तेरे भैया की चिता में बैठ कर उसके शव के साथ ही जल कर सती हो जाएगी।
                बालक राममोहन इस भयानक घटना की कल्पना करके ही कांप गया। उसकी प्यारी सी भाभी, उसके खेल की साथी,  बिना किसी अपराध के जि़न्दा जला दी जाएगी और इस हत्या से पाप लगने के स्थान पर उल्टे कुल का और समाज का भला होगा, यह बात उसकी समझ से बाहर थी। महिलाएं जबर्दस्ती उसकी रोती हुई भाभी का दुल्हन की तरह श्रृंगार कर रही थीं। राममोहन दौड़कर अपनी भाभी के पास पहुंचा और उसने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने चिल्लाते हुए कहा-
मैं अपनी भाभी को सती नहीं होने दूंगा। भैया के मरने में भाभी का क्या दोष है?  मैं किसी को इनकी हत्या नहीं करने दूंगा।
                राममोहन का चिल्लाना सुनकर लोग-बाग उसके आस-पास जमा हो गए। उसे लगा कि अब सब उन दुष्ट महिलाओं से उसकी भाभी को बचा लेंगे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ,  उल्टे एक आदमी ने बढ़कर राममोहन को पकड़ लिया और दूसरे ने उसके गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। राममोहन की माँ दौड़कर उसके पास पहुंचीं पर वह भी उसकी मदद करने के स्थान पर उसे ही डांटकर कहने लगीं -
अभागे ! अधर्म की बात करता है?  सती प्रथा का पालन करने में बाधा पहुंचाएगा तो सीधा नरक जाएगा।
                राममोहन के देखते-देखते धर्म के ठेकेदार उसकी भाभी को घसीटते हुए उसके पति की चिता तक ले गए। वह बेचारी प्राणों की भीख मांगती रही पर वहां शंख,  घडि़याल और ढोल की आवाज़ में उसकी पुकार सुनने वाला कौन था?  दो पल में ही रोती-चीखती, दया की भीख मांगती, राममोहन की बेबस भाभी आग की लपटों में समा गई। सती मैया के जय-जयकार ने राममोहन के दुख को और बढ़ा दिया। बालक राममोहन की आँखों के आंसू अब सूख चुके थे,  उनमें अब अंगारे थे। उसने सती की  चिता की गर्म राख को मुट्ठी में भरकर प्रण किया -
मैं आज यह शपथ खाता हूं कि इस हत्यारी प्रथा का समाज से नामो-निशान मिटा दूंगा। चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान की बाज़ी ही क्यों न लगानी पड़े।
                उस दिन से राममोहन को रीति-रिवाज के नाम पर भांति-भांति की कुरीतियों और अंध-विश्वासों से चिढ़  हो गई। जब उसने पण्डितो और मौलवियों को धर्म के नाम पर भोले-भाले ग्रामवासियों को ठगे जाते देखा तो उसके हृदय में उनके प्रति भी कोई श्रद्धा नहीं रह गई। कुछ दिनों पहले तक सामान्य बालकों की तरह उछल-कूद करने वाला राममोहन अब धीर-गम्भीर हो गया था। वह दिन-रात पुस्तकों का ही अध्ययन करता रहता था। इन पुस्तकों में धार्मिक ग्रंथ भी होते थे और नीति व दर्शन के भी। \
राममोहन ने हिन्दू धर्म के सच्चे स्वरूप को जानने का प्रयास किया। उसने हिन्दू धर्म के आधार ऋग्वेद, सहित चारो वेदों का अध्ययन किया पर यह जानकर उसे आश्चर्य हुआ कि सनातन हिन्दू धर्म वैदिक परम्पराओं से बहुत दूर चला गया है। ऋग्वेद में ईश्वर के एकत्व और उसके निराकार होने पर बल दिया गया है। मूर्तिपूजा, बहुदेव-वाद और अवतारवाद का उसमें कोई स्थान नहीं है। राममोहन ने धर्म के इसी रूप को स्वीकार किया और मूर्तिपूजा से मुंह मोड़ लिया। उसके सनातनी परिवार को उसका धार्मिक विद्रोह सहन नहीं हुआ। उसकी माँ श्रीमती फूल थाकुरानी ने उसको बुलाकर उससे पूछा -
राममोहन तूने मूर्ति-पूजा क्यों छोड़ दी?  क्या तू मुसलमान या क्रिस्तान हो गया है?
राममोहन ने जवाब दिया-
नहीं माँ! मैंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है। मैंने तो सच्चे वैदिक धर्म को अपनाकर मूर्ति-पूजा छोड़ी है।
माँ ने नाराज़ होकर कहा-
वेद अपनी जगह पर ठीक कहते होंगे पर हमारे कुल में मूर्ति-पूजा होती आई है और तुझे भी करनी पड़ेगी। नहीं करेगा तो परिवार तेरा बहिष्कार कर देगा।
मां और बेटा दोनों ही अपनी जि़द पर अड़े रहे। राममोहन ने मूर्ति-पूजा नहीं अपनाई तो माँ और परिवार वालों ने बेटे का ही परित्याग कर दिया। अपने सिद्धान्तों की खातिर राममोहन को घर और परिवार से निकाला जाना भी स्वीकार्य था।

एक विद्वान के रूप में अब तक राममोहन राय पूरे बंगाल में प्रतिष्ठित हो चुके थे। अपने विचार वह बुद्धि और विवेक की कसौटी पर परखने के बाद ही व्यक्त करते थे। इनमें न तो कोई पूर्वाग्रह होता था न किसी प्रकार की हठधर्मिता ही। उनके हृदय में दूसरो के विचारों के प्रति आदर और सहिष्णुता की भावना तो थी पर साथ ही साथ गलत को गलत कहने का साहस भी था। इसीलिए उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों पर खुलकर प्रहार किए। किसी भी बात को रीति-रिवाज,  परम्परा और संस्कार के नाम पर आंख मूंद कर स्वीकार कर लेना उन्हें सहन नहीं था। धर्म के नाम पर ढोंग करना उन्हें स्वीकार्य नहीं था।
  राममोहन राय ने नारी उत्थान को राष्ट्र के विकास के लिए पहली शर्त माना। स्त्री-शिक्षा पर लगे सामाजिक प्रतिबन्धों को तोड़ने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर अभिभावकों को इस बात के लिए तैयार करने का प्रयास किया कि वह अपनी बेटियों को उनके द्वारा स्थापित कन्या पाठशाला में पढ़ने के लिए भेजें। स्त्री-शिक्षा में बाधक पर्दा प्रथा और बाल-विवाह की प्रथा की हानियों पर भी उन्होंने प्रकाश डाला। उन्होंने बंगाल के ब्राह्मण समाज का कलंक कही जाने वाली कुलीन प्रथा पर निर्मम प्रहार किए। कुलीन प्रथा में उच्च कुलीन ब्र्राह्मण अपनी बेटियों का विवाह अपने से ऊँचे कुल में ही कर सकते थे और इस कारण अनेक कन्याएं या तो अविवाहित रह जाती थीं अथवा उनका बेमेल विवाह कर दिया जाता था या एक ही वर को भारी दहेज देकर अनेक कन्याएं ब्याह दी जाती थीं। बाल-विवाह और बाल-वैधव्य की त्रासदी भी इस कुरीति से जुड़ी थी। राममोहन राय ने इस कुरीति के विरुद्ध जन-जागृति अभियान छेड़ा।
उन्होंने कन्या-विक्रय और स्त्रियों को पति और पिता की सम्पत्ति में कोई भी अधिकार न दिए जाने जैसी सामाजिक कुरीतियों पर भी जमकर प्रहार किए।
स्त्रियों के इस उद्धारक ने सती प्रथा के उन्मूलन के लिए तो अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया। उन्होंने सती की घटना को जघन्य हत्या माना। उनके द्वारा स्थापित ‘आत्मीय सभा’ ने सती प्रथा को वैदिक परम्परा के विरुद्ध बताया। ‘धर्म सभा’ के कट्टर पंथियों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी तो उन्होंने उसकी भी परवाह नहीं की। अनुदारवादी पत्र ‘समाचार चन्द्रिका’ में उनकी लगातार निन्दा की जाती रही पर इससे भी सती प्रथा के उन्मूलन हेतु उनका अभियान थमा नहीं। इस प्रथा को कानूनन अपराध घोषित कराने के लिए उन्होंने मैटकाफ और बेंटिंग जैसे उदार ब्रिटिश अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करने का हर सम्भव प्रयास किया। इस काम के लिए उन्होंने एलेक्जे़ण्डर डफ़ जैसे ईसाई धर्म प्रचारक की भी मदद ली। कभी वह सरकार को उसकी प्रगतिशीलता का वास्ता देते थे तो कभी जागरूक भारतीयों से अनुरोध करते थे कि वह भारतीय समाज को कलंकित करने वाली इस कुप्रथा को दूर करने में उनका साथ दें। अपने तर्कों से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करते थे कि सती प्रथा एक सामाजिक कुरीति है न कि एक शास्त्र-सम्मत धार्मिक परम्परा। सरकार को वह यह भरोसा दिलाने में भी सफल रहे कि सती प्रथा के उन्मूलन से भारत में किसी प्रकार के सैनिक विद्रोह की सम्भावना नहीं है। अन्ततः उनके भगीरथ प्रयासों से 1829 में गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिग के शासनकाल में रेग्युलेशन 17 के द्वारा सती प्रथा को ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया गया। उस दिन राममोहन राय को अपनी सती भाभी की
बहुत याद आ रही थी। वह मन ही मन अपनी मृत भाभी से कह रहे थे -
भाभी! जब तुम्हें लोग जबर्दस्ती चिता में बिठाकर जला रहे थे, तब मैं छोटा था और कानून अंधा था। आज मैं बड़ा हो गया हूं और कानून को आँखे मिल गई हैं। अब सती मैया के जय-जयकार और शंख, ढोल व घडि़याल के शोर के बीच किसी मासूम की हत्या नहीं होने दी जाएगी।