मंगलवार, 8 अगस्त 2017

वसीयत

आज ही के दिन 75 साल पहले बॉम्बे जिमखाना मैदान (आज का आज़ाद मैदान) में एक आमसभा में महात्मा गाँधी तथा देश के अनेक शीर्षस्थ नेताओं के समक्ष अगले दिन अर्थात 9 अगस्त से 'भारत छोड़ो आन्दोलन' प्रारंभ किए जाने की घोषणा की गयी थी. 8 अगस्त की रात्रि को ही प्रमुख नेताओं के बंदी बना लिए जाने के कारण आन्दोलन का नेतृत्व मुख्यतः नौजवानों के हाथों में आ गया था. इसी पृष्ठभूमि पर मैंने अपनी कहानी 'वसीयत' की रचना की है.
वसीयत
सितम्बर, 1942 की एक शाम का वाक़या (घटना) था. शेख कुर्बान अली ने अपनी हवेली में कोतवाल हरकिशन लाल की बड़ी आवभगत की और उनको विदा करते वक़्त उनकी जेब में चुपके से एक थैली भी सरका दी. शेख साहब की हवेली से वैसे भी कोई सरकारी मुलाज़िम (कर्मचारी) कभी खाली हाथ नहीं जाता था पर आज कुछ ख़ास ही बात थी. कोतवाल साहब की रुखसती (विदाई) के बाद से शेख साहब को उदासी और फ़िक्र ने घेर लिया था. कोतवाल साहब ने उन्हें ऐसी ख़ुफ़िया (गुप्त) खबर सुनाई थी कि उनके होश फ़ाख्ता हो गए थे.
आला अंग्रेज़ अफ़सरों (बड़े-बड़े अंग्रेज़ अधिकारियों) के साथ रोज़ाना उठने-बैठने वाले शेख साहब का सरकार में बड़ा दबदबा था. अंग्रेज़ हुकूमत उनकी वफ़ादारी और उनकी बर्तानिया सरकार को की गयी खिदमत से इतनी खुश थी कि इस साल उन्हें ‘नाईटहुड’ यानी कि ‘सर’ का ख़िताब देने की सोच रही थी. ये खबर उन्हें खुद यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ के गवर्नर मॉरिस जी. हेलेट साहब ने सुनाई थी.
इधर शेख साहब की बरसों की मुराद पूरी होने ही वाली थी और उधर उनके साहबज़ादे की कारस्तानी उनके अरमान मिटटी में मिलाने पर आमादा थी. कोतवाल साहब खबर लाए थे कि शेख साहब के साहबज़ादे ज़फर अली बागी होकर लखनऊ में ‘क्विट इंडिया मूवमेंट’ की अगवाई करेंगे और सरकार उनको और उनके तमाम गुमराह (पथ-भ्रष्ट) साथियों की इस बागी हरक़त को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी.
शेख साहब को अंग्रेज़ हुकूमत की वफ़ादारी करने की सीख अपने वालिद, दादा और परदादा से मिली थी. अपनी जान को ख़तरे में डालकर 1857 के ग़दर (विद्रोह) में उनके पुरखों ने अंग्रेज़ों के बीबी, बच्चों को अपने यहाँ पनाह (शरण) दी थी. बगावत को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने उनके पुरखों पर इनामात और जागीर की झड़ी लगा दी थी. शेख साहब इस मेहरबानी के लिए हमेशा अंग्रेजों के शुक्रगुज़ार (कृतज्ञ) रहते थे और वो अंग्रेजों की ख़िदमत (सेवा) करने का कोई भी मौक़ा अपने हाथ से जाने नहीं देते थे. उन्होंने फ़र्स्ट वर्ड वॉर और फिर सेकंड वर्ड वॉर में भी वॉर-फ़ण्ड में लाखों रुपयों का चंदा दिया था और अपने जागीर के तमाम नौजवानों को फ़ौज में भर्ती भी करवाया था.
अपने बेटे ज़फर अली की इस गुस्ताख़ हरक़त ने उनका कलेजा चीर कर रख दिया था –
‘भला अंग्रेज़ हुकूमत उस शख्स को ‘सर’ का ख़िताब कैसे दे सकती थी जिसका कि ख़ुद का बेटा उस सरफिरे गांधी का चेला हो?’
‘ऐसे बागी के हिस्से में तो आएंगी पुलिस की लाठियां, गोलियां या जेल और उसके बाप के हिस्से में आएंगी ज़िल्लत (अपमान) और जग-हंसाई.’
क्या-क्या अरमान लेकर उन्होंने अपने खानदान के पहले ग्रेजुएट इस लड़के को लखनऊ यूनिवर्सिटी में एम. ए. इंग्लिश में दाखिला दिलवाया था? इस ज़हीन (मेधावी) लड़के को आई. सी. एस. अफ़सर (इंडियन सिविल सर्विस का अधिकारी) बनने से कोई रोक नहीं सकता था पर अब खुद उसकी अपनी बेवकूफ़ी उसकी किस्मत पर ग्रहण बनकर छा गयी थी. साहबज़ादे ने अपने तमाम विलायती सूट अपने नौकरों में बाँट दिए थे और खुद खद्दर के मोटे, खुरदरे कपड़े पहनना शुरू कर दिया था. इतना ही नहीं, स्वदेशी के चक्कर में उन्होंने खुद चरखे पर सूत कातना भी सीख लिया था. चलो शेख साहब साहबज़ादे की ऐसी बेजा (अनुचित) हरक़तें भी बर्दाश्त कर लेते पर उनकी बागी शायरी (विद्रोही कविता) तो वो क़तई बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. साहबज़ादे की गज़लों में, उनकी नज़्मों में कभी ब्रिटिश सरकार का तख्ता पलटने की बात होती थी तो कभी स्वदेशी और आज़ादी की बात होती थी. पता नहीं उनके जैसे वफ़ादार के घर में इस दूसरे रामप्रसाद बिस्मिल ने कैसे जनम ले लिया था?
शेख साहब ने नौकर भेजकर ज़फर अली को अपने कमरे में तलब किया. ज़फर अली हाज़िर हुआ तो शेख साहब ने उस से पूछा –
‘क्यों जनाब ! सुना है कि कल आप लखनऊ यूनिवर्सिटी से अपने हाथों में तिरंगा लेकर असेंबली हाउस तक जाने वाले हैं?’
ज़फर अली ने जवाब दिया –
‘जी अब्बा हुज़ूर, आपने सही सुना है. कल के जुलूस में मैं ही तिरंगा लेकर सबसे आगे रहूँगा.’
शेख साहब ने फिर सवाल किया –
‘सुनते हैं अंग्रेज़ हुकूमत की आने वाली मौत पर आपने एक मर्सिया (मृत्यु पर कहा जाने वाला शोक गीत) भी लिखा है?’
ज़फर अली ने जोश के साथ कहा –
‘मैं इस मर्सिये को गाते हुए ही जुलूस में निकलूंगा और मेरे साथ मेरे तमाम साथी भी इसको गाएंगे.’
शेख साहब ने गुस्से से कहा –
‘तुम्हें अपना बेटा कहने में मुझको शर्म आती है. अपनी इन बेहूदा हरक़तों के बाद तुम क्या आई. सी. एस. में सेलेक्ट हो पाओगे? क्या तुम्हारी बगावत के बाद तुम्हारे वालिद को कोई सरकार ‘सर’ का ख़िताब देगी?’
ज़फर अली ने जवाब दिया –
‘अब्बा हुज़ूर ! आई. सी. एस. बनकर अपने ज़मीर को बेचने वालों में मेरा शुमार कभी मत कीजिएगा. और रही आपको ‘सर’ का ख़िताब देने की बात तो आप गुलामी के इस ताज को पहनकर कुछ हासिल तो क्या करेंगे, अलबत्ता लाखों हिन्दुस्तानियों की नफ़रत के हक़दार ज़रूर बन जाएंगे.’
शेख साहब गुस्से से तमतमा कर बोले –
‘तुम्हारा लीडर गाँधी बैरिस्टरी छोड़कर सत्याग्रही बन गया और अब तुम अपनी तालीम छोड़कर स्वराजी बन गए हो. गाँधी तो बूढ़ा हो गया है पर क्या तुम जवानी में ही सठिया गए हो?’
ज़फर अली चहचहा कर बोला –
‘अब्बा हुज़ूर ! आपने महात्मा जी के साथ मेरा नाम जोड़कर मेरा रुतबा बढ़ा दिया. दुआ कीजिए कि हमारा कल का जुलूस ब्रिटिश हुकूमत के ताबूत में आखरी कील ठोकने में कामयाब हो.’
शेख साहब ने ज़फर अली को समझाते हुए कहा –
‘साहबजादे ! हिंदुस्तान में बर्तानिया हुकूमत (ब्रिटिश शासन) का तख्ता पलटने की हर कोशिश नाकाम रही है और आगे भी रहेगी. इस वक़्त दूसरी आलमी जंग (द्वितीय विश्व-युद्ध) चल रही है. हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही के खिलाफ़ जंग में हमको अंग्रेजों का साथ देना चाहिए. जैसे ही जंग ख़त्म होगी, तो हम हिन्दुस्तानियों को हमारी सरकार तमाम सहूलियत (सुविधाएँ) और हुकूक (अधिकार) खुद ही दे देगी.’
ज़फर अली ने मुस्कुराकर पूछा –
‘क्या वैसी ही सहूलियतें और हुकूक जैसे कि पहली आलमी जंग के बाद हमको जलियाँ वाला बाग़ में दिए गए थे या फिर हाल ही में क्रिप्स साहब (मार्च, 1942 का खोखले सुधारों का ‘क्रिप्स प्रस्ताव’ जिसको कि सभी भारतीय राजनीतिक दलों ने खारिज कर दिया था) दे रहे थे?’
शेख साहब के पास ज़फर अली के इस सवाल का तो कोई जवाब नहीं था पर फिर भी वो अपनी पुरानी ज़िद पर ही अड़े रहे. उन्होंने उसे अपना फ़ैसला सुनाया –
‘तुम अगर कल के जुलूस की लीडरी करोगे तो मेरी जायदाद, मेरी जागीर, सबसे बेदख़ल कर दिए जाओगे.’
ज़फर अली ने इस फ़ैसले के लिए अपने अब्बा हुज़ूर का शुक्रिया अदा किया और फिर उनसे रुखसती की इजाज़त मांग ली.
अगली सुबह शेख साहब ने अपने बेटे को फिर से समझाने की कोशिश की. उन्होंने उसे लालच दिया कि वो आला अंग्रेज़ अफ़सरों (बड़े अंग्रेज़ अधिकारियों) से उसकी सिफ़ारिश कर उसे ऑनरेरी मजिस्ट्रेट बनवा देंगे पर बेटा था कि अपनी स्वराजी ज़िद पर ही अड़ा रहा. शेख साहब ने एक बार फिर उसे जायदाद से बेदख़ल करने की धमकी दी तो वो बोला –
‘अब्बा हुज़ूर ! आप मेरी मानें तो अपनी सारी जागीर मुझे नहीं, बल्कि महात्मा जी को दान में दे दें. और हाँ, आप मुझे अपनी वसीयत में कुछ दें या न दें पर मैं अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई यानी अपनी पूरी इन्क़लाबी शायरी आपके नाम कर के ही इस दुनिया से रुखसती करूंगा.’
शेख साहब इस बात को सुनकर गुस्से से आगबबूला होना चाहते थे पर पता नहीं क्यों उनकी आँखें भर आईं और अचानक ही अपने गुस्ताख बेटे पर उन्हें प्यार उमड़ पड़ा.
‘खुदा तुम्हें हर बला से महफूज़ (भगवान तुम्हें हर मुसीबत से सुरक्षित रक्खे) रक्खे’,
यह कहकर उन्होंने अपने बेटे को गले लगाकर उसे जुलूस के लिए रुखसत किया.
ज़फर अली ने अपने अब्बा से विदा ली. अपनी हवेली ने निकलते हुए वो शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की पसंदीदा नज़्म गुनगुना रहा था –
‘सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है, देखना है, ज़ोर कितना, बाज़ुए क़ातिल में है.’
लखनऊ यूनिवर्सिटी का टेनिस ग्राउंड आन्दोलनकारी छात्रों से भरा हुआ था. दसियों तिरंगे आसमान में लहरा रहे थे पर ज़फ़र अली के हाथ का तिरंगा उन में सबसे ऊंचा था. जुलूस असेम्बली हाउस की तरफ़ बढ़ा. ज़फर अली अपना ही एक क़लाम गा रहा था –
‘ज़ुल्म की हर इंतिहा इक हौसला बन जाएगी, और नाकामी मुझे, मंजिल तलक पहुंचाएगी,
क्या हुआ जो हुक्मरां, छलनी करें सीना मेरा, ये शहादत कौम को, जीना सिखाती जाएगी.’
(हर बार अत्याचार की अधिकता हमारे साहस का कारण बनेगी और असफलता हमको हमारे लक्ष्य तक पहुंचाएगी. क्या हुआ यदि शासकगण गोलियों से मेरा सीना छलनी कर दें? मेरा बलिदान देशवासियों को सच्चे अर्थों में जीना सिखाता जाएगा.)
‘भारत छोड़ो’, ‘क्विट इंडिया’ और ‘करो या मरो’ के नारों से पूरा लखनऊ गूँज रहा था. और मुस्तैद पुलिस चुप होकर जुलूस को असेंबली हाउस तक बढ़ने दे रही थी पर जैसे ही जुलूस अपनी मंजिल के करीब पहुंचा, पुलिस ने उसको रोकने कोशिश में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया. पर आज़ादी के दीवाने कहाँ रुकने वाले थे? लाठियों की बौछार सहते हुए आन्दोलनकारी बढ़ते रहे. अंधाधुंध लाठियां खाते हुए भी जब आन्दोलनकारी रुके नहीं तो वार्निंग के तौर पर पुलिस का हवाई फायर भी हुआ पर उसका भी कोई असर नहीं हुआ. पुलिस की लाठियों की चोट से ज़ख़्मी ज़फर अली हाथ में तिरंगा लेकर असेम्बली हाउस की तरफ़ बढ़ता रहा, बढ़ता रहा. फिर अचानक ही – ‘फ़ायर’ की गर्जना हुई और पुलिस की पहली गोली ज़फर अली के सीने के पार निकल गयी.
ज़फर अली ज़मीन पर गिर पड़ा पर पाक (पवित्र) तिरंगे को उसने फिर भी अपने हाथ से गिरने नहीं दिया.
उस दिन तो पुलिस की फ़ायरिंग के बाद जुलूस तितर-बितर हो गया. पर अगले दिन फिर लखनऊ यूनिवर्सिटी से असेंबली हाउस के लिए एक और जुलूस निकला. इस जुलूस की मंज़िल असेंबली हाउस नहीं, बल्कि कर्बला (कब्रगाह) थी. यह जुलूस कल वाले जुलूस से बिलकुल अलग था, इसके आगे भी ज़फर अली था और उसका तिरंगा भी. पर इस बार ज़फर अली तिरंगा अपने हाथ में थामे नहीं था बल्कि वो उसमें उसमें खुद लिपटा हुआ था और उसके जनाज़े में उसको कन्धा देने वाले शेख कुर्बान अली जुलूस की अगवाई करते हुए शहीद रामप्रसाद बिस्मिल और अपने बेटे की पसंदीदा नज़्म गा रहे थे -
‘सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है, देखना है, ज़ोर कितना, बाज़ुए क़ातिल में है.’
शेख कुर्बान अली का सर आज फ़ख्र से ऊंचा हो गया था. उनके बेटे ने अपनी वसीयत में अपना बेशकीमती इन्क़लाबी क़लाम देकर उन्हें दुनिया का सबसे अमीर इन्सान बना दिया था और अपनी शहादत से उसने उन्हें ‘सर’ से कहीं ऊंचा ख़िताब दिलवा दिया था. अब वो शम्मा-ए- आज़ादी पर मर-मिटने वाले परवाने (स्वतंत्रता रुपी ज्योति पर मर-मिटने वाले शलभ), शहीद ज़फर अली के वालिद थे.

सोमवार, 31 जुलाई 2017

कलम का सिपाही

कलम का सिपाही –
कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती हर साल 31 जुलाई को मनाए जाती है. इस दिन उनकी जन्मभूमि लमही में उनके टूटे-फूटे स्मारक में एक समारोह हो जाता है और कई जगह उनके पुराने चित्रों को झाड-पोंछकर उन पर मालाएं चढ़ा दी जाती हैं. छात्र-छात्राओं को प्रेमचंद पर भाषण प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर दिया जाता है और सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त साहित्यकार व साहित्यिक अभिरुचि का दावा करनेवाले राजनीतिज्ञ उन्हें उपन्यास सम्राट तथा कहानी सम्राट का तमगा पहना देते हैं.
प्रेमचंद के देहावसान को इक्यासी वर्ष बीत चुके हैं पर आज भी उनके उपन्यासों और कहानियों के पात्र जीवंत प्रतीत होते हैं. अगर हमको उनकी रचनाओं में से केवल एक पात्र चुनना हो तो हम निश्चित ही ‘गोदान’ के होरी को चुनेंगे. किसान से खेतिहर मजदूर बना अशिक्षित और दुनियादारी से सर्वथा वंचित होरी आज भी दिन-रात मेहनत करने के बावजूद क़र्ज़ के बोझ तले दबा हुआ है. खेतिहर मजदूर होने की वजह से किसी भी विपदा में उसे सौ-दो सौ के चेक के रूप में कोई सरकारी मदद भी नहीं मिल सकती. उसकी घरवाली धनिया, उसकी बेटियां रूपा और सोना, भगवान न करे, अगर सुन्दर हुईं तो ज़रूर कोई न कोई महाजन या किसी ज़मींदार का वंशज उन पर घात लगाये बैठा होगा. फसल अगर ख़राब हो गयी तो उसके पास न तो खाने को रहेगा और न ही कर्जे की किश्त चुकाने को. ऐसे में गले में रस्सी का फन्दा ही उसका एक मात्र सहारा हो जाता है. हमारे भारत महान में, हमारे शाइनिंग इंडिया में, अनगिनत होरी अपनी करुण गाथा लिखवाने के लिए प्रेमचंद का आवाहन कर रहे हैं –
हे प्रेमचंद, फिर कलम उठा, नवभारत का उत्थान लिखो,
होरी के लाखों पुनर्मरण पर, एक नया गोदान लिखो.
प्रेमचंद के सुपुत्र श्री अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ लिखकर हिंदी-उर्दू भाषियों के साहित्य प्रेम पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ा है. गांधीजी के आवाहन पर शिक्षा विभाग की अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर हमारा कथा सम्राट असहयोग आन्दोलन में भाग लेता है और हमेशा-हमेशा के लिए गरीबी उसका दामन थाम लेती है. उसके बिना कलफ और बिना इस्तरी किये हुए गाढ़े के कुरते के अन्दर से उसकी फटी बनियान झांकती रहती है. उसकी पैर की तकलीफ को देखकर डॉक्टर उसे नर्म चमड़े वाला फ्लेक्स का जूता पहनने को को कहता है पर उसके पास उन्हें खरीदने के लिए सात रुपये नहीं हैं. वो अपने प्रकाशक को एक ख़त लिख कर उसमें विस्तार से अपनी तकलीफ बताकर सात रुपये भेजने की गुज़ारिश करता है. अभावों से जूझता हमारा नायक जब अंतिम यात्रा करता है तो उसे कन्धा देने के लिए दस-बारह प्रशंसक जमा हो जाते हैं. शव यात्रा देखकर कोई पूछता है –
‘कौन था?’
जवाब मिलता है –
‘कोई मास्टर था.’
प्रेमचंद हमेशा अपनी रचनाओं और अपने प्रगतिशील पत्रों – ‘हंस’ तथा ‘जागरण’ के माध्यम से स्वदेशी, सांप्रदायिक सद्भाव, नारी-उत्थान और दलितोद्धार का सन्देश देते रहे. उनका सम्पूर्ण साहित्य धार्मिक सामाजिक, आर्थिक शोषण, असमानता, अनाचार, भ्रष्टाचार, पाखंड, लिंग भेद, अन्धविश्वास, अकर्मण्यता, आलस्य, जातीय दंभ, बनावटीपन, शेखीखोरी, असहिष्णुता, धर्मान्धता, विलासिता, खोखली देशभक्ति और अवसरवादिता के विरुद्ध संघर्ष है. उन्हें अल्लामा इकबाल का यह शेर बहुत पसंद था –
‘जिस खेत से दहकान को मयस्सर न हो रोटी,
उस खेत के हर खेश-ए-गंदुम को जला दो.’
(जिस खेत से खुद किसान को रोटी नसीब न हो, उस खेत की गेंहू की हर बाली को जला दो)
पर इस शेर का मर्म समझने की हमारे देश के नेताओं को आजतक फुर्सत नहीं है. प्रेमचंद के उपन्यास ‘गबन’ का अमर पात्र देवीदीन जो असहयोग आन्दोलन के दौरान अपने दो बेटों की क़ुरबानी दे चुका है, देश के एक भावी कर्णधार से पूछता है कि क्या वो ये नहीं सोचते कि जब अँगरेज़ चले जायेंगे तो इनके बंगलों पर वो खुद क़ब्ज़ा कर लेंगे. नेताजी के हाँ कहने पर देवीदीन सोचने लगता है कि इस आज़ादी की लड़ाई में क़ुरबानी देने से आम आदमी को क्या मिलेगा. आज भी हम उसी देवीदीन की तरह असमंजस की स्थिति में हैं पर अब हमारा खुद से प्रश्न होता है –‘क्या हम वाकई आजाद हो गए हैं?’
आज हमको फिर एक नए प्रेमचंद की ज़रुरत है, आज फिर हमको आम आदमी का दर्द समझने वाले कलम के सिपाही की दरकार है, आज फिर ‘गबन’, ‘गोदान’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि’, ‘सदगति’, ‘सवा सेर गेंहू’, ‘ठाकुर का कुआँ’ ‘ईदगाह’, पूस की रात’ ‘कफ़न’, और ‘मन्त्र’ लिखे जाने की ज़रुरत है क्योंकि आज भी वही अन्याय और वही अनाचार फल-फूल रहा है जिसके खिलाफ कभी प्रेमचंद ने निर्भीकता से आवाज़ बुलंद की थी.
प्रेमचंद की रचनाएँ तो सीमित हैं किन्तु भारतीय जन-मानस पर उनका प्रभाव असीमित और शाश्वत है. लेकिन आज प्रेमचंद का गुणगान करने के स्थान पर ज़रुरत इस बात की है कि उनका अनुकरण कर हम भी उन्हीं की तरह अन्याय के खिलाफ़ साहस के साथ आवाज़ उठाएं और धर्म के, समाज के , राजनीति के, असंख्य भ्रष्ट ठेकेदारों को बेनकाब कर उनको उनके सही अंजाम तक पहुंचाएं और मजलूमों को, मेहनतकश को, सर्वहारा को, उनका वाजिब हक़ दिलवाएं.

रविवार, 30 जुलाई 2017

रजिस्ट्रार गुरु जी

रजिस्ट्रार गुरु जी –
रजिस्ट्रार गुरु जी से मेरा आशय उन गुरुजन से नहीं है जो कि अध्यापक और रजिस्ट्रार का दायित्व एक साथ सम्हालते हैं बल्कि उन विभूतियों से है जो कि क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति दर्ज करने के लिए अपना अटेंडेंस रजिस्टर खोलते हैं या फिर पढ़ाते समय अपने नोट्स वाले रजिस्टर से उनको इमला लिखाते रहते हैं. इस प्रकार रजिस्टर, अनेक गुरुजन के लिए जीवन-दायिनी ऑक्सीजन के समान है. मैं ऐसी विभूतियों को रजिस्ट्रार गुरु जी कहता हूँ. जो विद्वान कक्षा में अपने रजिस्टर अथवा अपनी फाइलों से नोट्स लिखाने के स्थान पर छोटे-मोटे लेक्चर भी दे लेते हैं पर हमेशा अपने सामने पॉइंट्स लिखी हुई पुर्चियाँ सामने रखते हैं, उन्हें मैं डिप्टी रजिस्ट्रार कहता हूँ. 
अपने छात्र जीवन में मुझे कई रजिस्ट्रार गुरुजन से ज्ञान (?) प्राप्त हुआ है. गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, इटावा में मैं कक्षा 6 में पढ़ता था. हमारे साइंस के मास्साब को ज़बर्दस्ती हमको संस्कृत पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी दे दी गयी. मास्साब को संस्कृत का ‘क’, ‘ख’, ‘ग’ भी नहीं आता था. वो बेचारे संस्कृत गद्य का पाठ भी गाकर करते थे और उसका अर्थ बिना किसी झिझक के, कुंजी से उतारे हुए नोट्स देख कर हमको लिखवाते थे. इस प्रकार बचपन में ही मुझे एक रजिस्ट्रार गुरु जी मिल गए थे. 
अब मैं कक्षा छह से सीधे अपने बी. ए. के दिनों में आता हूँ. झाँसी के बुंदेलखंड कॉलेज में इतिहास के हमारे विभागाध्यक्ष डॉक्टर बी. डी. गुप्ता प्रसिद्द विद्वान थे. उनके पढ़ाने के अंदाज़ का मैंने आजीवन अनुकरण किया है पर हमारी बदकिस्मती से बी. ए. फाइनल में उनकी जगह कोई गोलमटोल काली माई नहीं, बल्कि ताड़का जैसी कोई मिस तिवारी हमको यूरोप का इतिहास पढ़ाने आ गईं. मिस तिवारी बहन मायावती की तरह हमेशा बोलते समय रजिस्टर अपने सामने रखती थीं और हमको लेक्चर देने के बजाय सिर्फ़ नोट्स लिखाती रहती थीं. सबसे दुखदायी बात यह थी कि उनके नोट्स '’राजहंस प्रकाशन’ की एक मेड इज़ी की हूबहू कॉपी हुआ करते थे. हम लोग रोते हुए डॉक्टर गुप्ता के पास गए पर उन्होंने हमको डांट कर भगा दिया और साथ में हमको ये चेतावनी भी दे डाली कि अगर हमने मैडम के क्लास में कोई हंगामा किया तो वो हमारे खिलाफ़ एक्शन भी लेंगे. हम बेचारे खून का घूँट पीकर मिस गोलमटोल तिवारी द्वारा बोली गयी इमला को लिखने को मजबूर हो गए. 
कुछ समय पहले मैंने आलम और उनकी रंगरेजन प्रेमिका द्वारा रचित प्रश्नोत्तरनुमा यह दोहा पढ़ा था –
‘कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन,
कटि को कंचन काटि के, कुचन मध्य, धर दीन.’
ताड़का रूपी मिस तिवारी के ज़बर्दस्ती नोट्स लिखाने के अत्याचार के फलस्वरुप मेरे अन्दर का सोया हुआ कवि जाग उठा और मैंने आलम-रंगरेजन के दोहे की तर्ज़ पर एक दोहा लिख मारा –
‘लौह घड़ा सी बाम्हनी, काहे को मति हीन,
मेड इज़ी से नोट्स दे, चैन ले गयी छीन.’
इस दोहे की भनक पता नहीं कैसे हमारे डॉक्टर बी. डी. गुप्ता तक पहुँच गयी. उन्होंने मिस तिवारी की उपस्थिति में अपने कक्ष में मुझे बुलाकर मुझसे मेरा दोहा सुना, फिर मुझे कस कर डांटा पर पता नहीं क्यों उनकी खुद की हंसी फूट पड़ी. ‘खी, खी, खी’ करते हुए उन्होंने मुझसे भाग जाने को कहा तो फिर मैं वहां से मिल्खा सिंह की स्पीड से अपनी जान बचाकर भाग आया.
लखनऊ विश्ववियालय में मध्यकालीन एवं भारतीय इतिहास में एम. ए. करते समय भी एक रजिस्ट्रार गुरु जी ने हमको बहुत दुखी किया था. हम लोगों ने आन्दोलन कर के उनके नोट्स लिखवाने की आदत पर अंकुश लगवा दिया था. यह बात दूसरी है कि हमारे ये गुरु जी बिना नोट्स देखे जब बोलते थे तो न तो वो बहादुर शाह प्रथम और बहादुर शाह द्वितीय में कोई फ़र्क करते थे और न ही बाजी राव प्रथम और बाजी राव द्वितीय में. एक बार तो उन्होंने अकबर और रानी दुर्गावती के बीच हुई लड़ाई को अकबर और अहल्या बाई के बीच लड़ाई में बदल दिया था.
लखनऊ विश्वविद्यालय और कुमाऊँ विश्वविद्यालय में कुल 36 साल पढ़ाते समय मैंने खुद कभी रजिस्टर या नोट्स का सहारा नहीं लिया. इस बात में कोई ख़ास कमाल नहीं है. इतिहास जैसे विषय को समझकर पढ़ना-पढ़ाना चाहिए न कि उसे रट कर. और अगर आप उसको समझने का प्रयास करते हैं तो पढ़ाते समय नोट्स वाला रजिस्टर आपके लिए सिर्फ एक अनावश्यक बोझ है और कुछ नहीं. 
कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर के इतिहास विभाग में जब मेरी नियुक्ति हुई तो मैंने अपने साथियों से उनकी रजिस्ट्रार-प्रवृत्ति का परित्याग करने का अनुरोध किया. चंद सहकर्मियों ने तो मेरे प्रस्ताव का स्वागत करते हुए उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया पर प्रतिष्ठित रजिस्ट्रार महोदयों ने मेरे खिलाफ़ जिहाद छेड़ दिया. 
मेरे एक सहयोगी थे, अगर वो भूल से अपना पढ़ने वाला चश्मा घर ही छोड़ आते थे तो उनके अनुरोध पर या तो मुझे उनकी जगह क्लास लेना पड़ता था या फिर वो विद्यार्थियों के बीच उस दिन फ़िल्मी अन्त्याक्षरी करवा देते थे. उनके रजिस्टर प्रेम की एक कथा बड़ी प्रसिद्द है. एक दिन वो अपने रजिस्टर से हल्दीघाटी के युद्ध के बारे में विद्यार्थियों को लिखवा रहे थे पर कथा उस दिन पूरी नहीं हुई. अगले दिन वो गलती से यूरोपियन हिस्ट्री वाला रजिस्टर ले आए और उन्होंने वॉटरलू के मैदान में राणा प्रताप को हरवा दिया. 
मुझे आजीवन अपने रजिस्ट्रार गुरुजन के कोप का भाजन होना पड़ा है पर मैं अपनी मोटी चमड़ी का क्या करूं? लाख प्रताड़ना के बाद भी रजिस्ट्रार गुरुजन को मैं काहिल, जाहिल और गुरु के नाम पर कलंक मानने से बाज़ नहीं आया. 
मेरे अवकाश-प्राप्ति पर मेरे साथियों ने मुझे औपचारिक विदाई भी नहीं दी और न ही मेरे ऊपर कोई माला चढ़ाई. खैर फिर भी रजिस्ट्रार गुरुजन के खिलाफ़ मेरी मुहिम, मेरी जंग आज भी जारी है. यह बात और है कि अब यह जंग फेसबुक और मेरे ब्लॉग तक सीमित रह गयी है.
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रविवार, 23 जुलाई 2017

स्वराज्य का मंत्रदाता

लोकमान्य तिलक के जन्मदिन पर एक अप्रकाशित रचना -
स्वराज्य का मन्त्रदाता -
मराठा पेशवाओं के वंश में 23 जुलाई, 1856 में एक बालक का जन्म हुआ था। बचपन से ही मेधावी इस बालक ने शिवाजी और बाजीराव प्रथम की गौरवशाली उपलब्धियों को फिर से प्राप्त करने का संकल्प ले लिया था। शिवाजी के बचपन की लीलास्थली और पेशवा बाजीराव प्रथम की कर्मस्थली पूना में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक बार फिर स्वराज्य की स्थापना का सपना संजोया जा रहा था। शिवाजी के स्वप्न को अखिल भारतीय स्तर पर साकार करने का बीड़ा उठाने वाला पेशवाओं का वंशज, स्वराज्य की हुकार भरने वाला देशभक्त था- हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन का पहला जन-नायक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक।
साधारण आर्थिक स्थिति के परिवार में जन्मे इस बालक को देश के उत्थान की उत्कट कामना थी। जिस आयु में बच्चों को परियों की कहानियां सुनना और लुका-छिपी के खेल अच्छे लगते हैं और तरह-तरह की शरारतों व धमा-चौकड़ी करने में ही उनका दिन बीतता है, उस आयु में यह बालक देश को आज़ाद कराने की चिन्ता में लीन रहता था। भारत को ग़ुलामी की बेडि़यों में जकड़े देख कर उसको चैन से नींद नहीं आती थी। बचपन से ही धीर-गम्भीर, अध्ययनशील बाल गंगाधर तिलक ने अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था। गणित, संस्कृत, मराठी, दर्शन, तर्क-शास्त्र और न्याय-शास्त्र पर उसकी गहरी पकड़ थी। इतिहास में उसकी गहरी रुचि थी। शिवाजी की वीरता और उनके साहसिक अभियानों ने उसे यह विश्वास दिला दिया था कि प्रयास करने पर वर्तमान काल में भी भारतीय खुद को गुलामी की बेडि़यों से मुक्त करा सकते हैं। बालक गंगाधर कहता था-
‘मैं बड़ा होकर शिवाजी के सपने को साकार करूंगा। स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है । अंग्रेज़ों ने हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी, हमारी आपसी फूट का लाभ उठाकर हमको गुलाम बना लिया है। हम भारतीय एक होकर उनकी इस चाल को नाकाम कर देंगे और भारत में स्वराज्य स्थापित कर देंगे।‘
दस वर्ष की अल्पायु में बाल गंगाधर के सर पर से माँ का और सोलह वर्ष की आयु में पिता का साया उठ गया पर यह किशोर अपने विद्याध्ययन के लक्ष्य से पल भर के लिए भी विचलित नहीं हुआ। पिता की मृत्यु से एक वर्ष पूर्व पन्द्रह वर्ष की आयु में उसका विवाह भी हो गया था। बाल गंगाधर के विवाह से जुड़ा हुआ एक रोचक प्रसंग है। बाल गंगाधर के श्वसुर उसे दहेज के रूप में कुछ सामान व नकद रुपये देना चाहते थे पर दहेज-प्रथा के विरोधी इस किशोर को यह भेंट स्वीकार्य नहीं थी। श्वसुर के बार-बार अनुरोध पर उसने भेंट लेना स्वीकार तो किया पर अपनी शर्तों पर। उसने अपने श्वसुर से कहा-
‘मान्यवर! मैं भेंट के रूप में केवल एक वस्तु ही स्वीकार करूंगा। यदि आप कुछ देना ही चाहते हैं तो मुझे उपयोगी पाठ्य पुस्तकें खरीद कर दे दें।‘
दहेज के रूप में दामाद को पाठ्य पुस्तकें देते हुए बाल गंगाधर के श्वसुर अपने सौभाग्य पर स्वयम् ही आश्चर्य चकित हो रहे थे।
अपने चाचा के संरक्षण में, डेकेन कॉलेज पूना में बाल गंगाधर का अध्ययन जारी रहा। मेधावी बाल गंगाधर के अध्ययन के खर्च का काफ़ी बड़ा हिस्सा तो उसकी छात्रवृत्ति से ही पूरा हो जाता था। यहीं से उसने सन् 1876 में बी. ए. और सन् 1879 में एलएल. बी. किया।
अपने विद्यार्थी जीवन के साथी दस्तूर, आगरकर और चन्द्रावरकर के साथ बाल गंगाधर तिलक ने देश-सेवा और शिक्षा प्रसार का स्वप्न देखा था। युवक तिलक भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अतीत का अध्ययन करके इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि भारतीय जागृति के लिए पश्चिम के मार्ग-दर्शन पर आश्रित होना या योरोपीय पुनर्जागरण का अंधानुकरण करना बिलकुल भी आवश्यक नहीं है। उनका विचार था-
‘भारतीय इतिहास की गौरवशाली परम्पराओं का निर्वाह करने वाले और विवेक व नीति की कसौटी पर खरे उतरे मूल्यों की पुनर्स्थापना से ही भारत का सर्वतोमुखी विकास हो सकता है।‘
युवक तिलक यह नहीं मानते थे कि सभ्यता के प्रसार-प्रचार का एकाधिकार पाश्चात्य देशों का या मात्र गोरी जाति का है। ऐतिहासिक प्रमाणों से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि आर्य सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता थी पर सदियों की कूपमण्डकता, हठवादिता, आपसी कलह, आलस्य, स्वार्थपरता और कायरता ने भारतीय अवनति के अनगिनत द्वार खोल दिए थे। मध्यकाल की पराधीनता से भी कोई सबक न सीखकर भारतीय अब भी आत्मघाती प्रवृत्तियों में मग्न थे। जब तिलक उन्नीसवीं शताब्दी के दीन-हीन और परतन्त्र भारत की तुलना प्राचीन काल के गौरवशाली भारत से करते थे तो उनका भावुक मन उदास हो जाता था। उन्हें तब और भी कष्ट होता था जब पाश्चात्य सभ्यता की श्रेष्ठता का दावा करने वाले अंग्रेज़ भारतीयों को सभ्य बनाने का बीड़ा उठाने की बात करते थे। तिलक जानते थे कि सशस्त्र क्रांति के माध्यम से अंग्रेज़ों को भारत से खदेड़ना असंम्भव था इसलिए यह आवश्यक था कि अंग्रेज़ी शासन में रहते हुए ही भारतीय अपने सर्वतोमुखी उत्थान का प्रयास करें और अंग्रेज़ों को यह दिखा दें कि उनकी मदद के बिना ही भारतीय अपना कल्याण कर सकते हैं। उन्होंने अंग्रेज़ों को सुधार के बहाने भारतीयों के सामाजिक और धार्मिक मामलों में टांग अड़ाने से बड़ी सख्ती से मना किया। बाल-विवाह की प्रथा के वह घोर विरोधी थे पर जब प्रसिद्ध समाज सुधारक माल्बरी ने बाल-विवाह पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास किया तो उसका विरोध करते हुए उन्हांने कहा-
‘किसी विदेशी सरकार को हमारे घरेलू मामलों में, हमारी सामाजिक और धार्मिक परम्पराओं में सुधार के नाम पर अपनी टांग अड़ाने की आवश्यकता नहीं है। हममें अपनी सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों को दूर करने की पूरी क्षमता है। सरकार इस विषय में कोई भी कानून बनाएगी तो हम उसका विरोध करेंगे।‘
तिलक स्वयम् सामाजिक सुधारों के समर्थक थे पर वह समाज सुधार से पहले राजनीतिक सुधार लाना चाहते थे। सन् 1879 में अपनी शिक्षा पूरी करने के तुरन्त बाद अपने मित्र आगरकर के साथ तिलक ने एक स्वदेशी विद्यालय की स्थापना की। तिलक का अध्यापक रूप अत्यन्त प्रखर था। हिन्दू लॉ के अध्यापन में उनकी सी ख्याति बहुत कम लोगों को ही मिल सकी थी। तिलक कहते थे-
‘मैं सरकारी नौकरी करने की तो कभी सोच भी नहीं सकता। अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मेरी हिन्दू लॉ की प्रशिक्षण कक्षाएं ही पर्याप्त हैं।‘
तिलक का स्वाभिमान और उनका देशप्रेम उन्हें प्रेरित कर रहा था कि वे भारतीयों में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जागृति लाने के लिए पत्रकारिता का आश्रय लें। अपने साथी श्री आगरकर और श्री चिपलूणकर के साथ उन्होंने सन् 1881 में दो पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ किया । ये पत्र थे मराठी में ‘केसरी’ और अंग्रेज़ी में ‘दि मराठा’। एक ओर मराठा और केसरी का प्रकाशन भारतीयों के लिए आत्मसम्मान और आत्मविश्वास की नयी सुबह के समान था तो दूसरी ओर यह अंग्रेज़ों के अहंकार और उनके शोषक व अन्यायी साम्राज्य के क्षितिज पर छाए प्रलय के बादल के अंधकार की भाँति था। इन पत्रों ने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में निर्भीक और प्रतिबद्ध पत्रकारिता के नए मापदण्ड स्थापित किए।
लोकमान्य तिलक को अपने गुरु जस्टिस एम. जी. रानाडे से बहुत कुछ सीखने को मिला था परन्तु वह नहीं चाहते थे कि भारतीय नवजागरण पर पश्चिम के सुधारवादी आन्दोलन की मुहर लगे। तिलक इन सबसे कुछ हटकर करना चाहते थे, वह चाहते थे कि उनके विचारों को पढ़कर भारतीयों में साहस, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और आत्मबलिदान की भावना का संचार हो जाए।
अपने पत्रों ‘केसरी’ और ‘दि मराठा’ के माध्यम से उन्होंने भारत में राजनीतिक चेतना के प्रसार को नयी गति प्रदान की। तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से ही उससे जुड़ गए परन्तु उन्हें राजनीतिक और आर्थिक सुधारों के लिए अंग्रेज़ों से याचना करने की नरम-पंथी कांग्रेसी नीति स्वीकार्य नहीं थी। उन्होंने अपने अधिकारों को लड़कर प्राप्त करने का सुझाव दिया।
‘शिवाजी उत्सव’ और ‘गणेश उत्सव’ के माध्यम से उन्होंने भारत के प्राचीन गौरव को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने लार्ड कर्ज़न के दमनकारी शासन (1899-1905) का खुलकर विरोध किया। स्वराज्य की प्राप्ति के लिए वह अब अंग्रेज़ों से संघर्ष करने के लिए तैयार थे।
‘केसरी’ की लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही थी। सरकारी नीतियों की इतनी कटु और निर्भीक आलोचना आजतक किसी भी पत्र ने नहीं की थी। पाश्चात्य सुधारवादी आन्दोलन के एक भक्त ने लोकमान्य से प्रश्न किया-
” आप ब्रिटिश शासन का इतना विरोध क्यों करते हैं? क्या आप यह नहीं जानते कि अंग्रेज़ न आते तो हम अब भी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक पिछड़ेपन और राजनीतिक अनाचार के शिकार हो रहे होते? “
लोकमान्य का उत्तर था-
‘भारत में सुधार और विकास का श्रेय अंग्रेज़ों को देना अनुचित है। अंग्रेज़ी मुर्गा बाँग नहीं देता तो क्या भारत की सुबह होती ही नहीं? जब भारत जगद-गुरु और सोने की चिडि़या कहलाता था तब अंग्रेज़ पत्तों और मृगछालों से अपना तन ढकते थे तो क्या हम यह कहें कि इस आधार पर उन पर हम भारतीयों का शासन होना चाहिए था?’
लोकमान्य भारत की आर्थिक अवनति को देखकर बहुत दुखी होते थे। हमारी अकर्मण्यता ने हमको विदेशी सामान पर पूरी तरह से निर्भर बना दिया था। लोकमान्य ने भारतीयों की इसी आलसी प्रवृत्ति के लिए भारतीयों को फटकारते हुए कहा था-
‘हमारे आलस की अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम विलायत को गोबर का निर्यात करेंगे और वहां से बने हुए उपलों का आयात करके अपने घरों का चूल्हा सुलगाएंगे।‘
‘केसरी’ और ‘दि मराठा’ निर्भीकता और साहस के साथ सरकार के वादों को खोखला बता रहे थे। जब वादों को वास्तविकता में बदलने का मौका आता था तो सरकार बहाने बाज़ी पर आ जाती थी। सन् 1892 के इण्डियन कौंसिल्स एक्ट के पारित होने पर भारतीयों को लोकतान्त्रिक व्यवस्था की झलक भी नहीं मिली। लोकमान्य ने अंग्रेज़ों के वादों पर भरोसा करने वालों को सावधान करते हुए कहा था-
‘माँगने से तो भीख भी नहीं मिलती, स्वराज्य क्या मिलेगा? साम्राज्यवादी ताकत से कुछ भी लेना है तो लड़कर लेना होगा। हमको अपने देश की सरकार चलाने का पूरा अधिकार है। हम राजद्रोह नहीं कर रहे हैं बल्कि सरकार को प्रजा द्रोह के घोर पाप से बचा रहे हैं। स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम उसे लेकर रहेंगे।‘
लोकमान्य की आलोचनाओं से सरकार की सुधारवादी छवि को गहरा धक्का लगा था। उनका स्वदेशी जागरण अभियान भारतीयों में साहस, आत्मविश्वास और कर्मठता की भावना जगा रहा था। लोकमान्य चाहते थे कि भारतीय अपने आदर्श नायकों की तलाश के लिए पश्चिम की शरण न जाएं बल्कि भारतीय परम्परा और इतिहास में ही उनकी खोज करें। बुद्धि के देवता विघ्न-नाशक गणेश के जन्म, गणेश चतुर्थी को उन्होंने गणेशोत्सव के रूप में राष्ट्रीय पर्व में बदल दिया। शिवाजी उत्सव का आयोजन उनका ऐसा ही एक और कदम था। छत्रपति शिवाजी को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्थापित करने में भी उनका यही उद्देश्य था कि विदेशी शासन के विरुद्ध सफल विद्रोह और फिर हिन्द स्वराज्य की स्थापना करने वाले इस महानायक के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा लेकर हम अत्याचारी और शोषक विदेशी शासन का विरोध करने के लिए एकजुट हो जाएं।
ब्रिटिश सरकार महाराष्ट्र के सिंह से और उसके ‘केसरी’ के बढ़ते प्रभाव को देखकर थर्राने लगी थी। वह इस शेर को पिंजड़े में कैद करने का बहाना ढूंढ़ रही थी जो कि उसे सन् 1897 में मिल गया। महाराष्ट्र में व्यापक रूप से फैली प्लेग के निवारण के लिए प्लेग कमिश्नर रैण्ड प्लेग से ग्रस्त घरों और गाँवों को जला रहा था. ‘केसरी’ ने रैण्ड के अत्याचारों की कटु आलोचना की थी। रैण्ड के अत्याचारों से क्षुब्ध चापेकर बंधुओं ने उसकी हत्या कर दी। लोकमान्य को हिंसा भड़काने वाले लेख लिखने का दोषी माना गया और देश के इस पूज्य नेता को सश्रम कारावास दिया गया।
लार्ड कर्ज़न के अत्याचारी शासन के विरुद्ध भारत भर में आन्दोलन करने वाले लोकमान्य ने बंगाल विभाजन के विरोध में सन् 1905 में स्वदेशी आन्दोलन नेतृत्व किया था। अंग्रेज़ों की फूट डालकर शासन करने की नीति की पोल खुल गई थी। स्वदेशी आन्दोलन ने लंकाशायर और मैनचेस्टर के कारखानों में बने माल को गोदामों में ही सड़ने लिए मजबूर कर दिया था। भारतीय उद्योग इस आन्दोलन की बदौलत फिर से लहलहा उठे थे। पूरा देश स्वराज्य की माँग कर रहा था। अंग्रेज़ सरकार अपने सबसे बड़े शत्रु को फिर से जेल में भेजने का बहाना ढूंढ़ रही थी। सूरत में सन् 1907 में कांग्रेस की फूट का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने गरम दल के नेताओं के दमन का षडयन्त्र रचा। एक बार फिर लोकमान्य पर हिंसा भड़काने वाले लेख लिखने का आरोप सिद्ध किया गया। इस बार उन्हें छह साल का कठोर कारावास देकर भारत से बाहर माण्डले (बर्मा) भेज दिया गया।
लोकमान्य ने जेल-प्रवास में अपने अमर ग्रंथ ‘गीता रहस्य’ की रचना की। इस ग्रंथ ने देशवासियों को अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया। लोकमान्य जब माण्डले जेल के लिए भारत छोड़ रहे थे तो अपनी पत्नी से उन्होंने अपने ‘केसरी’ और ‘मराठा’ के प्रकाशन को जारी रखने के विषय में चिन्ता व्यक्त की थी। श्रीमती सत्यभामा तिलक ने उनसे कहा था -
‘आप देशसेवा के लिए इतना कठोर दण्ड उठाने जा रहे हैं। इन पत्रों के प्रकाशन की चिन्ता आप मुझ पर छोड़ दीजिए। आप निश्चिन्त होकर माण्डले जाइए।‘
सन् 1914 में लोकमान्य को मुक्त किया गया। घर आ कर उन्होंने देखा कि ‘केसरी’ और ‘मराठा’ पहले की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं। लोकमान्य की समझ में यह नहीं आ रहा था कि लगातार छह साल तक नुक्सान उठाते हुए श्रीमती तिलक इन पत्रों का प्रकाशन कैसे करवाती रहीं। लोकमान्य के भारत लौटने तक उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सत्यभामा तिलक की मृत्यु हो चुकी थी किन्तु उन्होंने अपने जीते जी अपने पति के पत्रों के नियमित प्रकाशन के लिए अपने अनेक आभूषण बेच दिए थे. लोकमान्य तिलक को जब श्रीमती सत्यभामा तिलक के इस महान त्याग के विषय में पता चला तो उन्होंने कहा –
‘जिस देश की माताएं, बहनें, पुत्रियाँ और पत्नियाँ देश-सेवा के लिए ऐसा त्याग करने को तत्पर रहेंगी वह देश बहुत दिनों तक परतंत्र नहीं रह सकता.’
लोकमान्य के जीवन के अंतिम वर्ष होमरूल आन्दोलन को व्यापक बनाने में व्यतीत हुए। उन्होंने श्रीमती एनीबीसेन्ट के साथ मिलकर इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। लोकमान्य ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए विशेष प्रयास किए। सन् 1916 के कांग्रेस-मुस्लिम लीग समझौते में उनका विशेष योगदान था। लखनऊ में आयोजित कांग्रेस-मुस्लिम लीग के संयुक्त अधिवेशन में उनकी प्रेरणा से ही होमरूल की माँग रक्खी गई। पूरे भारत से आवाज़ उठी-
‘तलब फि़ज़ूल है, काँटो की फूल के बदले,
न लें बहिश्त भी हम होमरूल के बदले।‘
( जिस तरह फूल के स्थान पर काँटे नहीं लिए जा सकते, उसी तरह होमरूल के बदले में स्वर्ग भी नहीं लिया जा सकता।)
सन् 1917 में सरकार को भी ‘मान्टेग्यू घोषणा’ के अन्तर्गत स्वशासन की भारतीय माँग को सैद्धातिक रूप से स्वीकार कर लिया गया । लोकमान्य की यह महान राजनीतिक सफलता थी।
1917 के चंपारन आन्दोलन से देश के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व अब गांधीजी के कुशल हाथों में आ चुका था। बूढ़ा शेर थक चुका था। वह अब सदा-सदा के लिए सोना चाहता था। असहयोग आन्दोलन के शंखनाद के साथ ही अगस्त सन् 1920 में स्वराज्य के इस मन्त्रदाता ने आंखंग मूंद लीं। बिलखते हुए देशवासियों से जाते हुए वह मानो कह रहा था-
‘स्वराज्य की ज्योति को सदैव जलाए रखना।‘

रविवार, 18 जून 2017

हमारी दोस्त शबाना

हमारी दोस्त शबाना -
लखनऊ यूनिवर्सिटी से जब मैं मध्यकालीन एवं आधुनिक भारतीय इतिहास में एम. ए. कर रहा था तो हमारे क्लास में शबाना की गिनती सबसे खूबसूरत लड़कियों में हुआ करती थी. शबाना बहुत हंसमुख, ज़िंदादिल और मिलनसार लडकी थी. वो एक शायर की बेटी थी और खुद थोड़ी-बहुत शायरी भी कर लिया करती थी. ज़ाहिर है कि उसके नाम और उसके वालिद के शायर होने की वजह से लोगबाग उसकी तुलना शबाना आज़मी से करते पर हमारी वाली शबाना उस फ़िल्मी शबाना आज़मी से बहुत ज़्यादा खूबसूरत थी. हम आदर्श विद्यार्थी बिना शर्त अपना दिल उस को दे बैठे थे पर उस कमबख्त ने अपने हैण्डसम मंगेतर रियाज़ से हम दो-तीन दोस्तों को मिलवा कर हमारे सपनों को मिटटी में मिलवा दिया था. सबसे अफ़सोस की बात यह थी कि यह कमबख्त रियाज़ हम लोगों का दोस्त भी बन गया था.
रियाज़ भाई की चौक के बाज़ार में आर्टिफ़ीशियल ज्वेलरी की दुकान थी. मैं रियाज़ भाई से शिकायती लहजे में पूछा करता था –
‘रियाज़ भाई, आप तो आर्टिफ़ीशियल ज्वेलरी वाले हैं फिर आपको हमारा असली हीरा चुराने की क्या ज़रुरत थी?’
रियाज़ भाई बड़ी जिंदादिली से कहते थे –
‘इस जनम के लिए तो ये हीरा हमारा हुआ. गोपेश भाई, आप अगले जनम के लिए ज़रूर ट्राई कीजिएगा,’
खैर अब हम अगले जनम तक इंतज़ार करने के अलावा कर भी क्या सकते थे? खून का घूँट पीकर हमने रियाज़ भाई नाम के इस कड़वे सच को स्वीकार किया फिर भी शबाना हमारी प्यारी सी दोस्त बनी रही. शबाना की मंगनी की बात सिर्फ़ हम दो-तीन लड़कों को और उसकी दो-चार कन्या-मित्रों को पता थी. बाकी पुरुष समाज के लिए तो शबाना सबसे ऊंचे पेड़ की सबसे ऊंची फुनगी पर लटका हुआ वो अमृत फल था जिसके लिए हर कोई अपनी-अपनी गुलेल लेकर उसपर निशाना साधने में लगा रहता था.
अपने सहपाठियों को इतिहास पढ़ाने की मेरी आदत शबाना को बहुत सूट करती थी और इसके लिए वो मुझ पर कुछ एक्स्ट्रा मेहरबान रहा करती थी. फ़िल्मी अन्त्याक्षरी के दौरान शबाना हमेशा हमारी टीम में ही हुआ करती थी. हमारी बुज़ुर्ग आपा, शबाना और मेरी तिकड़ी बाकी सारे क्लास को फ़िल्मी अन्त्याक्षरी में हराने का माद्दा रखती थी.
हमारे बुज़ुर्गवार दिलफेंक कन्हैया गुरु जी शबाना के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए थे. उनको शबाना की मंगनी और उसके मंगेतर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी इसलिए शबाना का दिल जीतने की वो रोज़ाना कोशिश करते थे. कन्हैया गुरु जी को शबाना और मेरी दोस्ती क़तई पसंद नहीं थी पर बेचारे इस दोस्ती को तुड़वाने के लिए खुलेआम कुछ कर भी नहीं सकते थे.
अपने क्लास ख़त्म होने के बाद जब हम स्टूडेंट्स मस्ती करने के मूड में होते थे तो कन्हैया गुरु जी अपने सींग कटाकर हम बछड़ों की जमात में शामिल होने की हर कोशिश करते थे. हमको भी उनका लिहाज़ करके उन्हें अपने कार्यक्रमों में शामिल करना पड़ता था.
शबाना के सहारे हम कन्हैया गुरु जी का भरपूर शोषण किया करते थे. मैं शबाना से कहता –
‘शबाना, आज हम भूखों को समोसे और चाय की ट्रीट दे दे, तुझे बड़ा पुण्य मिलेगा.’
शबाना इस से साफ़ इंकार कर देती तो मैं कन्हैया गुरु जी का शोषण करने में उसकी मदद लेने की गुहार करता. मेरी इस दरख्वास्त को शबाना को मानना ही पड़ता. बाक़ी गुरु जी को चूना कैसे लगाना है, यह शबाना को सिखाने की किसी को ज़रुरत नहीं होती थी. साढ़े तीन बजे के बाद कन्हैया गुरु जी तितलियों की प्रतीक्षा में स्टाफ़ रूम में अकेले बैठे रहते थे.
शबाना, तीन चार सूरत कुबूल लड़कियां और हम दो-तीन मुस्टंडे उनके दरबार में पहुँच गए. शबाना कन्हैया गुरु जी से मेरी शिकायत करते हुए कहने लगी-
‘सर ये गोपेश कहता है कि आप के नोट्स बेसिकली के. के. दत्ता और आर. सी. मजूमदार की बुक्स पर बेस्ड होते हैं जब कि मेरा कहना है कि आप अपने नोट्स के लिए कम से कम दर्जन भर किताबें कंसल्ट करते हैं.’
‘कन्हैया गुरु जी ताना मारकर बोले –
‘हमारे गोपेश भाई तो तुम्हारे क्लास के सबसे ब्राइट स्टूडेंट हैं. वो मेरे नोट्स के बारे में सही ही कहते होंगे. वैसे शबाना, इस बार तुम करीब-करीब सही हो. सोशल, कल्चरल हिस्ट्री के नोट्स के लिए मैंने कुल 15 बुक्स कंसल्ट की हैं. अच्छा ये बताओ चाय पियोगी?’
शबाना चहककर बोली – ‘हाँ सर ज़रुर ! पर समोसों के साथ.’
अब गोपेश भाई को ज़िम्मेदारी दी गयी कि वो डिपार्टमेंट के चपरासी सह्बू जी से चाय समोसे मंगवाएं पर उत्साही गोपेश भाई अगर गुरु जी की तरफ़ से चाय-समोसे के साथ एक-एक गुलाब जामुन का आर्डर भी दे आए तो इस में किसको ऐतराज़ हो सकता था?
हम लोग जब एम. ए. फाइनल में थे तब कन्हैया गुरु जी के सामने एक बार शबाना ने कह दिया कि हम कुछ लड़के-लड़कियां पिकनिक और पिक्चर का प्रोग्राम भी बनाते रहते हैं. गुरु जी ने कुढ़ कर पूछा –
ये गोपेश और खान तो तुम्हारी पार्टी में ज़रूर होते होंगे?
शबाना ने हाँ में सर हिलाया तो गुरु जी बड़े आज़िज़ होकर बोले –
‘कभी हमको भी तुम लोग अपनी पिकनिक में शामिल कर लो.’
हम गुरु जी को कैसे मना करते? अगले ही रविवार पिकनिक का प्रोग्राम बना लिया गया. हमारी तो लाइफ़ बन गयी थी. उस सस्ते ज़माने में गुरु जी पूरे 50 रुपयों का कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे थे यानी कि हम विद्यार्थियों से पांच गुना.
हमारी पिकनिक बड़ी विविधता पूर्ण थी. हमको गुलाब सिनेमा में मुगले आज़म देखनी थी, फिर लड़कियों के घरों से आए माल को हम लड़कों के लाए अमरूदों, संतरों, मूंगफलियों और मिठाइयों के साथ शहीद स्मारक पर हज़म करना था और अंत में गोमती में बोटिंग करनी थी. फ़िल्म के टिकट्स और बोटिंग का खर्चा तो गुरु जी के योगदान से ही पूरा हो रहा था.
कन्हैया गुरु जी ने शबाना को उसके घर से गुलाब सिनेमा तक पिकअप करने का ऑफर किया पर उस दुष्टा ने उसे नम्रता के साथ ठुकरा दिया. हम लोग टिकट लेकर सिनेमा हॉल पहुंचे तो गुरु जी ने दो कार्नर सीट्स पर क़ब्ज़ा करके शबाना को बुलाकर कहा –
‘शबाना तुम हमारे पास बैठो. तुम तो खुद उर्दू की शायरा हो. हमारी उर्दू कमज़ोर है तुम हमको उर्दू के कठिन शब्दों के अर्थ बताती रहना.’
शबाना जब तक गुरु जी की आज्ञा का पालन करती तब तक मैंने कहा –
‘सर, हमारी आपा से ज़्यादा उर्दू का जानकार तो कोई नहीं है. आपा की सोहबत में तो आप खुद मुगले आज़म जैसे भारी-भरकम उर्दू के डायलाग बोलने लगेंगे.’
हमारी बुज़ुर्गवार निरूपा रॉय नुमा आपा, कन्हैया गुरु जी को उर्दू सिखाने के लिए उनकी बगल में बिठा दी गईं पर क्या मजाल कि पूरे साढ़े तीन घंटों में गुरु जी को फ़िल्म का एक भी शब्द, एक भी डायलॉग कठिन लगा हो.
जले-भुने गुरु जी फ़िल्म देखकर निकले तो वो मुझे लगातार घूर रहे थे. मैंने शहीद स्मारक के पार्क में उनकी जमकर खातिर की. उन्हें नमक लगाकर अमरुद खिलाया, उन्हें छील-छील कर मूंगफली खिलाईं पर वो तो मुझसे खफ़ा ही रहे आए.
बोटिंग करते समय एक और हादसा हो गया. कन्हैया गुरु जी इस बार स्मार्ट बनकर खुद ही शबाना के पास बैठ गए पर इस बार हमारा मल्लाह खलनायक बन गया. उसने गुरु जी से कहा –
‘मास्साब, नाव का बैलेंस ख़राब हो रहा है. आप नाव के एक किनारे पर बैठ जाइए और दूसरे किनारे पर ये भैया जी (मेरी और इशारा कर के) बैठ जाएंगे.’
फ़रवरी की खूबसूरत शाम और आसमान में उगता हुआ पूरनमासी का चाँद ! मुझे तो पन्त जी की कविता ‘नौका विहार’ याद आ रही थी पर हमारे गुरु जी को सहगल का नग्मा –‘जब दिल ही टूट गया, हम जीकर क्या करेंगे –‘ याद आ रहा होगा.
बोटिंग भी ख़त्म हुई. अब सब पंछियों को लौटकर अपने-अपने घोंसले जाना था. इस बार गुरु जी ने फिर बेशर्म होकर शबाना से कहा –
‘शबाना तुम रिक्शे पर नहीं जाओगी. अब तो मैं ही तुम्हें अपने स्कूटर से तुम्हारे घर ड्राप करूंगा.’
शबाना ने शरमाते हुए जवाब दिया –
‘थैंक यू सर ! पर मुझे तो कोई अपनी मोटर साइकिल पर लेने आ गया है.’
कन्हैया गुरु जी ने अपनी आँखों से अंगारे बरसाते हुए उस मोटर साइकिल सवार को घूरा तो मैंने उन्हें उसका परिचय देते हुए कहा –
‘सर, ये रियाज़ भाई हैं, शबाना के मंगेतर.’
अचरज से कन्हैया गुरु जी का मुंह इतना खुल गया था कि उसमें रियाज़ भाई अपनी मोटर साइकिल समेत समा सकते थे.
गुरु जी ने आह भरते हुए शबाना से पूछा –
ये तुम्हारे मंगेतर हैं? तुमने तो अपनी मंगनी के बारे में हमको कभी बताया नहीं?’
मैंने शिकायती लहजे में कहा –
‘सर ये शबाना और रियाज़ भाई दोनों बड़े दुष्ट हैं. इन्होने सबसे अपनी मंगनी की बात छिपाई है. अब तो जून में इनकी शादी है.’
गुरु जी ने आहत स्वर में मुझसे पूछा –
‘तुम लोग शबाना के इंगेजमेंट के बारे में कबसे जानते हो?’
मैंने जवाब दिया – ‘सर, यही कोई डेड़ साल से.’
गुरु जी ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और हमारा अभिवादन अस्वीकार करते हुए अपने स्कूटर को हवाई जहाज की स्पीड से दौड़ाते हुए, वो सर्र से निकल गए.
मैंने शबाना को उसके गुनाहे-अज़ीम के लिए कभी माफ़ नहीं किया. उसे रियाज़ भाई को बुलाने की क्या ज़रुरत थी? वो हमारे फाइनल एक्ज़ाम्स तक अपनी मंगनी की बात कन्हैया गुरु जी से छुपा सकती थी. इस से हम तब तक गुरु जी का निर्बाध शोषण कर सकते थे.
जिसका डर था, बेदर्दी वही बात हो गयी. कन्हैया गुरु जी के चेहरे पर फिर हमने हंसी देखी ही नहीं और फिर उन्होंने शबाना की तरफ भी कभी पलट कर नहीं देखा लेकिन सबसे दुखदायी बात यह थी कि शबाना और रियाज़ भाई की गुस्ताखियों में, उनकी साज़िशों में, मुझ भोले-भाले निर्दोष को भी बराबर का हिस्सेदार मान लिया गया था.

गुरुवार, 1 जून 2017

अमर प्रेम



अमर प्रेम –
अमर प्रेम की यह अनूठी दास्तान मेरी स्वर्गीया दादी श्रीमती सावित्री देवी और मेरे बाबा स्वर्गीय लाडली प्रसाद जैसवाल की है.
इस अनूठी प्रेम-गाथा की पृष्ठभूमि जानना भी आवश्यक है.
हमारे पर-दादा जी हाथरस के प्रतिष्ठित प्लीडर (लोअर कोर्ट्स का वकील) थे. हमारे पर-दादा जी बड़े पुख्ता रंग के थे और पर-दादी भी इस मामले में उनसे पीछे नहीं थीं. हमारे बाबा सहित, पर-दादा और पर-दादी की सभी संतानें उन्हीं के जैसी पक्के रंग की हुईं थीं. बेचारी पर-दादी उबटन और साबुन का लाख प्रयोग करती रहीं पर उनके बच्चे पूर्ववत जामुन जैसे ही रहे आए.
हमारी पर-दादी थीं बहुत होशियार. अपनी अगली से अगली पीढ़ी का रूप-रंग सुधारने के लिए वो अपनी तीनों बहुएं ऐसी लाईं कि उन्हें अगर अँधेरे में भी खड़ा कर दो तो उजाला हो जाए.
हाई स्कूल में पढ़ रहे पंद्रह वर्षीय चिरंजीव लाडली प्रसाद की शादी कक्षा दो पास और बारह वर्षीय आयुष्मती सावित्री देवी से संपन्न हुई.
हमारे बाबा को सुन्दर बहुएं लाने का अपनी माँ का फ़ैसला पसंद आया था पर उन्हें अपनी दादी से यह शिक़ायत थी कि सुन्दर बहुएं लाने की बात उनके दिमाग में क्यूँ नहीं आई थी.
गोरी-चिट्टी हमारी अम्मा जितनी सुन्दर थीं, उस से ज़्यादा रौबीली थीं. हम लोग जब दुर्गा खोटे को फिल्मों में देखते थे तो उनकी तुलना अपनी अम्मा से करने लगते थे. और अपने बाबा की मनोहारी छवि का हम क्यों बखान करें? उन्हें कहाँ कोई सौन्दर्य-प्रतियोगिता जीतनी थी?
शादी के बाद हमारे बाबा ने अपनी पढ़ाई जारी रक्खी. उन्होंने बी. एससी. किया और वो रूड़की टॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज से सी. ई. (सिविल इंजीनियरिंग) का डिप्लोमा हासिल करके गोंडा में डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर हो गए. हमारी अम्मा भी किसी भी मामले में उनसे पीछे नहीं रहीं. अम्मा ने अपनी पढ़ाई तो जारी नहीं रक्खी पर घर-गृहस्थी सम्हालने के साथ-साथ अगले चौबीस साल तक औसतन हर दो साल के अंतराल पर घर में एक राजकुमार या एक राजकुमारी को उन्होंने जन्म अवश्य दिया.
हमारे बाबा हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू और फ़ारसी के ज्ञाता थे पर हमारी अम्मा केवल ब्रज भाषा बोलती थीं. मैंने पाठकों की सुविधा के लिए अम्मा के डायलॉग भी खड़ी बोली में कर दिए हैं. 
अम्मा-बाबा का प्यार देखते ही बनता था. बाबा तो अम्मा को पिताजी और बड़े चाचा जी के घर के नाम पर ‘मुन्नू-चुन्नू की जिया’ कहकर पुकारते थे पर हमारी अम्मा, बाबा की पीठ पीछे उन्हें ‘अन्जीनियर साब’ कहती थीं और उनके सामने, अपनी ज़ुबान में मिस्री घोलकर उनको ‘सरकार’ कहकर संबोधित करती थीं.
खुद पक्के रंग के हमारे बाबा को दूसरों के रंग-रूप पर टिप्पणी करने की बहुत आदत थी और हमारी अम्मा बड़े प्यार से उन्हें ऐसा करने से टोकती रहती थीं. मेरे जन्म से पहले के ये किस्से हमारी माँ बड़े चटखारे ले-लेकर डायलॉग सहित हमको सुनाया करती थीं.
एक बार अम्मा ने बाबा से कहा –
‘सरकार ! डिप्टी कलक्टर सक्सेना के घर कथा है. उसने हम सबको बुलाया है.’
बाबा भड़के –
‘वो घमंडी सक्सेना? मैं नहीं जाता उसके यहाँ. वो उल्टा तवा ख़ुद को कामदेव समझता है और मुझे काला कहता है.’
अम्मा बोलीं –
‘ये तो उसकी बदतमीज़ी है. पर सरकार ! वो तुमसे तो गोरा है.  
बाबा गरज कर बोले – ‘तुम्हें तो मेरे सामने सारे कौए भी गोरे लगते हैं.’
अम्मा ने अपने कान पर हाथ रखते हुए कहा –
‘नहीं सरकार ! सारे कौए नहीं ! तुम पहाड़ी कौए से तो गोरे हो.’  
अम्मा की ज़िद के आगे बाबा को हर बार हारना पड़ता था और उस बार भी बेमन से ही सही, पर उन्हें उस घमंडी, उलटे तवे, डिप्टी कलक्टर सक्सेना के घर कथा सुनने जाना ही पड़ा.
एक बार हमारे बाबा बहुत बीमार पड़े. अधिकांश डॉक्टर्स और हकीमों ने तो अपने हाथ खड़े कर दिए थे. गोंडा के एक पंडित जी आयुर्वेदाचार्य भी थे. उन्होंने बाबा का इलाज करने की ठानी पर अम्मा के सामने उन्होंने यह शर्त रख दी कि वो हनुमान जी के दर्शन करने के लिए हर मंगलवार को मंदिर जाएंगी. जैन-धर्म की अनुयायी हमारी अम्मा के लिए ऐसी शर्त मानना मुश्किल हो सकता था पर उन्होंने इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया. बाबा पूर्णतः स्वस्थ हो गए और हमारी अम्मा फिर आजीवन हर मंगलवार को न सिर्फ़ हनुमान-मंदिर जाती रहीं बल्कि हर हनुमान जयंती पर अपने घर में प्याऊ लगवा कर भक्त-जन को बर्फ़ के ठंडे पानी के साथ प्रसाद में बताशे और पेड़े बाँटती रहीं. 
बाबा अपने बुढ़ापे में ऊंचा सुनने लगे थे. वो अव्वल तो दूसरों की बात सुन नहीं पाते थे और अगर सुनते भी तो उल्टा-सीधा सुनते थे. हमारी अम्मा इस से परेशान होकर कहती थीं –
‘सरकार ! कान में सुनने वाली मशीन लगवा लो. मैं अगर खेत की कहती हूँ तो तुम खलिहान की सुनते हो.’
बाबा जवाब देते –
‘मैं तो रिटायर हो गया हूँ. मुझे न खेत से मतलब है न खलिहान से. और हियरिंग एड के साढ़े तीन सौ रूपये क्या तुम्हारे मामा के यहाँ से आएँगे?’
स्वर्ग में बैठे हुए अम्मा के मामा ने हमारे बाबा की हियरिंग एड के पैसे कभी भेजे नहीं और उनकी हियरिंग एड अम्मा के जीते जी आई भी नहीं.
बाबा को अपने रिटायरमेंट के बाद पैसा खर्च करने में बड़ा दर्द होता था पर अम्मा उनसे अपनी हर फ़रमाइश पूरा कराना जानती थीं. अम्मा की हर फ़रमाइश पेश होने के बाद अम्मा-बाबा में जमकर बहस होती थी फिर बाबा झल्लाकर उन्हें –‘कुपड्डी कहीं की !’ कहकर उनकी फ़रमाइश पूरी करने के लिए अपनी जेब ढीली कर देते थे.
हमारे बड़े भाई साहब को अपनी अम्मा के लिए बाबा का ‘कुपड्डी कहीं की !’ कहना बिलकुल स्वीकार्य नहीं था. उन्होंने बाबा को राज़ी कर लिया कि वो आगे से अम्मा के लिए इस जुमले का इस्तेमाल नहीं करेंगे. अब बाबा, अम्मा से जब बहस में हारने लगते थे तो नाराज़ होकर कहते थे –‘प्रोफ़ेसर कहीं की !’
इस सुखद परिवर्तन पर खुश होने के बजाय अम्मा ने शिकायती लहजे में बड़े भाई साहब से कहा –
‘बेटा ! तूने तो मेरा नुक्सान कर दिया. तेरे बाबा मुझे कुपड्डी कह कर तो पूरी रकम ढीली कर देते थे पर अब प्रोफ़ेसर कहकर तो उसकी आधी ही देते हैं.’ 
हमारे बाबा ज्योतिषी होने का दावा भी करते थे और अक्सर गलत-सलत भविष्यवाणी भी किया करते थे. हम लोग 1956 से 1959 तक लखनऊ में थे और रिसालदार पार्क में रहते थे. बाबा स-परिवार महानगर की अपनी कोठी में रहते थे. एक बार बाबा ने हम सबको बुला भेजा. पता चला कि बाबा का मृत्यु-योग है और वो कल मध्य-रात्रि में स्वर्ग सिधार जाएंगे. पिताजी को कोर्ट से और हम बच्चों को स्कूल-कॉलेज से एक दिन की छुट्टी लेनी पड़ी थी. सब चिंतित थे पर अम्मा शांत होकर सबके खाने-पीने की व्यवस्था करा रही थी. पिताजी ने अम्मा को रोक कर उनके इतना शांत रहने का रहस्य पूछा तो वो बोलीं –
‘लल्लू ! कुछ अनहोनी नहीं होगी. मुझे तो तुम्हारे पिताजी और तुम सब बच्चों के कन्धों पर सवार होकर ही स्वर्ग जाना है. बस, तुम सब अंजीनियर साहब की नौटंकी देखो, भजन-कीर्तन करो, हलुआ पूड़ी खाओ और मौज करो.’
मध्य-रात्रि पर मृत्यु-योग बीत जाने पर भी जब बाबा सलामत रहे आए तो अम्मा ने हम सबको खूब मिठाई खिलाई.
बाबा की अपनी मृत्यु की भविष्यवाणियों को नौटंकी समझने वाली हमारी अम्मा उनके किडनी से स्टोन निकालने के लिए ऑपरेशन कराने की बात से बहुत घबरा जाती थीं. अम्मा को डर रहता था कि बाबा इस मामूली से ऑपरेशन के बाद बच नहीं पाएँगे. जैसे ही बाबा के इस ऑपरेशन की बात होती थी तो अम्मा कहती थीं –
सरकार ! इस ऑपरेशन से तुम बचोगे नहीं. और मुझे तो सुहागन ही मरना है इसलिए चाहे जो हो जाय तुम्हारा ऑपरेशन नहीं होगा.’
अम्मा की ज़िद के आगे बाबा को हर बार अपना ऑपरेशन टालना पड़ता था.
1966 में बाबा भयंकर बीमार पड़े. उन्हें लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया. स्टोंस निकालने के लिए उनकी किडनी के ऑपरेशन की फिर तैयारी होने लगीं. इस बार अम्मा का कोई प्रोटेस्ट उन्हें रोक नहीं पाया. पर अब अम्मा ने बाबा का ऑपरेशन रुकवाने का दूसरा तरीक़ा खोज लिया. बाबा तो अस्पताल में एडमिट थे और यहाँ घर में रहते हुए ही दो दिन की बीमारी में अम्मा की ऐसी हालत हो गयी कि बाबा को अपना ऑपरेशन टाल कर घर वापस आना पड़ा. अगले दिन ही अम्मा चल बसीं और अपने पति व अपने बच्चों के कंधे पर सवार होकर अपनी अंतिम यात्रा करने की उनकी साध पूरी हो गयी.
लाल साड़ी में लिपटी और एक सुहागन के सारे श्रृंगार किए हुए भूमिष्ठ अम्मा के गले में माला डालते समय बाबा ने अपनी आँखों से बहते आंसुओं की कोई परवाह न करते हुए कहा –
‘इसके माँ-बाप ने इसका नाम ‘सावित्री’ ऐसे ही थोड़ी रक्खा था.’
अम्मा के जाने के बाद उनकी ख्वाहिश पूरी करने के लिए बाबा ने हियरिंग एड भी खरीद ली पर चूंकि अब अम्मा नहीं थीं तो वो किसी और की बात सुनने के लिए उसका प्रयोग ही नहीं करना चाहते थे. हियरिंग एड की बेचारी बैटरी बिना इस्तेमाल हुए ही बेकार हो गयी.   
अम्मा की स्मृति में उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए कंजूस समझे जाने वाले बाबा ने जैसवाल जैन समाज के मेधावी छात्र-छात्राओं को वार्षिक पारितोषिक दिए जाने के लिए एक अच्छी ख़ासी रकम भी दान में दे दी.
बाबा ने फिर अपना कोई ऑपरेशन भी नहीं कराया. अम्मा की मृत्यु के दो वर्ष बाद तक वो और जीवित रहे पर वो रोज़ ही अपनी मृत्यु की कामना करते रहे.
मुझे अम्मा-बाबा की ये बे-मेल जोड़ी बहुत प्यारी लगती थी. उन दोनों की नोंक-झोंक, छोटे-मोटे झगड़े, रूठना-मनाना, अम्मा का फ़रमाइशी कार्यक्रम, बाबा का इंकार, फिर उनका अम्मा के सामने आत्मसमर्पण और एक-दूसरे के बिना एक पल भी गुज़ार न सकने की उनकी आदत, ये सब कुछ मुझे दिल को छू लेने वाली कोई रोमांटिक कहानी लगती थी.
अब अगर कोई फ़िल्म निर्माता ‘अमर प्रेम’ शीर्षक की दोबारा फ़िल्म बनाना चाहेगा तो मैं अपने अम्मा-बाबा की कहानी उसके सामने पेश कर दूंगा.      

सोमवार, 29 मई 2017

चाचा नेहरु के तीन भक्त

चाचा नेहरु के तीन भक्त -
बच्चों में नेहरु चाचा की लोकप्रियता बेमिसाल थी. हम सभी भाई-बहन भी उनके मुरीद थे. पर हमने अपने प्रिय चाचा को या तो तस्वीरों में देखा था या डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में, उनको रूबरू देखने का हमको कभी मौक़ा नहीं मिला था.
जनवरी, 1959 की बात है, मैं तब आठ साल का था. हम उन दिनों लखनऊ में रहते थे और जाड़े के मौसम में हर रविवार को प्रातः 10 बजे कैपिटल सिनेमा में दिखाई जाने वाली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म्स देखने जाया करते थे. एक बार की बात है कि हमारे बड़े भाई साहब घर पर ही थे पर बाक़ी हम तीन भाई जोश से लबरेज़ होकर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म देखने के लिए कैपिटल सिनेमा पहुँच गए. ये शिक्षाप्रद डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म्स ही हमारे मनोरंजन का साधन थीं और मज़े की बात यह थी कि इन्हें देखने के लिए खुद पिताजी हमको प्रोत्साहित करते थे. हमको इन्हें देखने के लिए अपना पॉकेटमनी खर्च करने की भी ज़रुरत नहीं होती थी क्यूंकि इसके लिए पिताजी ही हमारे फिनान्सर हुआ करते थे.
खैर हम कैपिटल सिनेमा पहुंचे (यह विधान सभा के सामने स्थित है), वहां आठ-आठ आने में बालकनी की तीन टिकटें लीं पर डॉक्यूमेंट्री शुरू होने में तो अभी पंद्रह मिनट का समय बाक़ी था.
हम बाहर सड़क पर आ गए तो देखा कि सड़क के दोनों तरफ़ बड़ी भीड़ है और हाथ में तिरंगे लिए सैकड़ों बच्चे क़तार में खड़े हुए हैं. हमने इसका सबब पूछा तो पता चला कि आधे घंटे बाद नेहरु जी का काफ़िला वहां से गुजरने वाला है. यह सुनकर मेरी खुशी का तो कोई ठिकाना नहीं रहा.
खुली जीप में खड़े हुए चाचा नेहरु हमको देखने को मिलेंगे? मुझे तो अपनी खुशकिस्मती पर विश्वास ही नहीं हो रहा था.
पर हाय, हम तो डॉक्यूमेंट्री देखने के लिए पूरे डेेड़ रूपये खर्च कर चुके थे. हमारे श्रीश भाई साहब दौड़ कर टिकट काउंटर पर गए और वहां उन्होंने बुकिंग क्लर्क से टिकट लौटा कर उनके पैसे वापस करने की बात की पर उसने टिकट वापस लेने से साफ़ इनकार कर दिया.
जैसे कि फ़िल्म मुगले आज़म में बादशाह अकबर ने महारानी जोधा से पूछा था - 'सुहाग चाहिए या औलाद?'
कुछ वैसा ही सवाल हमारे सामने था - ' डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म देखने का मौक़ा छोड़कर और अपने डेड़ रूपये बर्बाद करके हमको चाचा नेहरु को देखना है, या चाचा नेहरु को देखने का मौक़ा छोड़कर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म देखकर अपने डेड़ रूपये वसूल करने हैं?'
अंत में चाचा नेहरु के आगे डेड़ रूपयों की जीत हुई, हमने दुखी मन से पूरे एक घंटे तक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म देखी.
हम सिनेमा हॉल से बाहर निकले तो पता चला कि नेहरु जी 45 मिनट पहले वहां से जा चुके थे.
इसके बाद हमको फिर कभी अपने चाचा नेहरु से मिलने का मौक़ा नहीं मिला.
अपने चाचा नेहरु के हम तीन भक्तों को उनसे न मिल पाने का बहुत मलाल रहा पर उनसे हमको एक बड़ी शिक़ायत भी थी -
'नेहरु चाचा ! क्या आप उस रास्ते से गुजरने का समय आधा घंटा पहले का या डेड़ घंटे बाद का नहीं रख सकते थे?'