शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

अगले जनम बड़ी बिटिया न कीजो

अगले जनम बड़ी बिटिया न कीजो -
अवकाश-प्राप्ति के बाद हम अल्मोड़ा से ग्रेटर नॉएडा स्थित अपने मकान में शिफ्ट कर गए. झाड़ू-बर्तन करने के लिए रमा ने जिस महिला को काम पर रक्खा उसका कोई असली नाम तो जानता ही नहीं था. उसको सब गुड़िया की मम्मी के नाम से ही जानते थे. गुड़िया की मम्मी यही कोई तीस-इकत्तीस साल की रही होगी, छोटे से क़द की, कमज़ोर सी, थकी सी. लेकिन जब उसने काम किया तो घर और बर्तन दोनों ही चमका कर रख दिए.
एक दिन मैं गेट के पास कुर्सी पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था कि एक प्यारी सी, 11-12 साल की टिपटॉप लड़की मुझ से पूछने लगी –
‘अंकल जी, हमारी मम्मी क्या आपके घर में है?’
मैंने जवाब दिया-
‘नहीं बिटिया ! यहाँ तो कोई नहीं आया.’
बिटिया रानी मेरा जवाब सुनकर बड़ी परेशान हुई उसने फिर पूछा –
‘आप के यहाँ झाड़ू-बर्तन करने वाली आज क्या नहीं आई?’
मैंने लड़की को बताया –
‘गुड़िया की मम्मी तो अन्दर काम कर रही है.’
फिर एकदम से दिमाग की बत्ती ऑन हुई और मैंने उस से पूछा –
‘तू गुड़िया तो नहीं है?’
लड़की ने शर्माते हुए, मुस्कुराते हुए, अपना सर हिलाया और फिर वो घर के अन्दर चली गयी. मैं गुड़िया को देख कर हैरान था और परेशान भी था. हैरान इसलिए कि जिस घर में औरतों और लड़कियों की किस्मत में झाड़ू-बर्तन करना ही लिखा हो वहां लड़की का इतना सुन्दर होना किस काम का? और परेशान इसलिए था कि इस गरीब घर की लड़की की सुन्दरता आगे चलकर उसके लिए कोई मुसीबत न खड़ी कर दे.
चाइल्ड डेवलपमेंट की विशेषज्ञ हमारी बड़ी साहबज़ादी गीतिका उन दिनों कुछ दिन के लिए हमारे ही साथ रह रहीं थीं. गुड़िया के हाथों में झाड़ू देखी तो उन्होंने उसकी मम्मी को भाषण देना शुरू कर दिया और साथ में अपने मम्मी पापा को भी इस में लपेटना ज़रूरी समझा. बाल मज़दूरी कराने के गुनहगार तो हम भी थे ही.
गीतिका और हमारी हैरानी का तब ठिकाना नहीं रहा जब हमको पता चला कि गुड़िया अपने अकेले दम पर तीन-चार घर का काम सम्हालती है और घर की बड़ी बेटी होने के नाते अपने घर के सारे कामों में भी माँ का हाथ बटाती है.
हमारे घर में घुसते ही गुड़िया अपनी पसंद का कोई टीवी चेनल ऑन करवाती थी फिर काम करने की सोचती थी. उसकी मम्मी के मना करने के बावजूद हम लोग गुड़िया का फ़रमाइशी टीवी चेनल लगा देते थे फिर उसकी कार्य क्षमता में अद्भुत सुधार हमको दिखाई देने लगता था.
एक बार यू ट्यूब पर मैं चार्ली चैपलिन का बॉक्सिंग वाला मैच देख रहा था मेरे पीछे खड़े होकर गुड़िया भी इस ऐतिहासिक मुक्केबाज़ी को देख रही थी. हँसते-हँसते गुड़िया पागल हुई जा रही थी. उसके अनुरोध पर उस दिन लगातार कई बार यह मुक्केबाज़ी होती रही और आने वाले दिनों में भी गुड़िया किसी टीवी चेनल को ऑन करने की जगह पर मुझ से कहने लगी -
अंकल जी, कम्पूटर पर जरा चार्ली ऑन कर दो.’
रमा को गुड़िया कुछ ज़्यादा ही प्यारी लगती थी और उसे भी शायद सब घरों में सबसे अधिक आनंद हमारे घर ही आता था. गुड़िया रमा को रोज़ाना कोई न कोई नया फ़िल्मी समाचार ज़रूर सुनाती थी. उसके सवालात भी आमतौर पर फ़िल्मी या टीवी दुनिया से ही जुड़े होते थे.
मेरे तो समझ में नहीं आता था कि ऐसी मस्त और बाल-स्वभाव की बच्ची घर और बाहर के काम को इतनी ज़िम्मेदारी से कैसे संभाल सकती है. अपने से छोटे चार भाई-बहनों का ख़याल रखने में गुड़िया में वाक़ई बहुत बड़प्पन था. रमा गुड़िया को कभी कोई पकवान देती थी तो उसे वो खुद खाने के बजाय अपने भाई-बहनों के लिए बचाकर रख लेती थी.
फ़िल्म ‘दीवार’ में मज़दूरी करने वाली माँ जब अपने बड़े बेटे विजय से कहती है कि वो अपने दोनों बेटों की पढ़ाई का बोझ नहीं उठा सकती है तो वो कहता है –
‘हम दोनों मेहनत कर के अकेले रवि (छोटा भाई) को तो पढ़ा सकते हैं.’
यहाँ इस बात का जिक्र इसलिए आया कि गुड़िया ने खुद मेहनत करके अपने माँ-बाप के सामने ये शर्त रख दी कि उसके अलावा घर का कोई और बच्चा दूसरों के घरों में काम नहीं करेगा और बाक़ी सब बच्चों को स्कूल भी भेजा जाएगा.
हमारी बेटी गीतिका और दामाद वैभव जब दुबई चले गए तो रोज़ाना स्काइप पर उन से बात होने लगी. गुड़िया को दूर बैठी दीदी से बात करने में बहुत आनंद आता था. जब हमारे नाती अमेय को गुड़िया ने पहली बार स्काइप पर देखा तो वो उस से मिलने के लिए छटपटाने लगी एक दिन वो मुझ से पूछने लगी –
‘अंकल जी दुबई जाने में कितना पैसा लगता है? मैं लाला को देखने दुबई जाऊंगी.’
मैंने जवाब दिया –
‘गुड़िया, अपने लाला से मिलने के लिए तुझे दुबई जाने की कोई ज़रुरत नहीं है. वो होली पर ग्रेटर नॉएडा आ रहा है.’
अमेय के साथ खेलते हुए गुड़िया हमारे घर का काम करना भी भूल जाती थी. उसकी मम्मी काम करने का उस से तकाज़ा करती थी तो वो बागी हो जाती थी. अमेय का ग्रेटर नॉएडा का हर प्रवास गुड़िया के लिए विशुद्ध आनंद का समय होता था और हमारे अमेय के लिए भी गुड़िया के पीछे-पीछे भागना उसकी सबसे फ़ेवरिट एकसरसाइज़.
अमेय थोड़ा बड़ा हुआ तो उसकी फ़रमाइश पर इन्टरनेट पर मुझे उसका मनपसंद कार्टून लगाना पड़ता था और अगर उसकी गुड़िया दीदी तब घर में मौजूद होती थी तो उसे अपने साथ बिठाना उसका हक़ बन जाता था.
कार्टून देखते हुए दोनों बच्चे इतना शोर मचाते थे कि दीपावली में होने वाला पटाखों का शोर भी उनके सामने पानी भरने लगे.
लेकिन फिर गुड़िया की खुशियों को मानो नज़र लग गयी. उसकी मम्मी बीमार क्या पड़ी सब घरों के काम का बोझ उस पर पड़ गया. थकी-मांदी गुड़िया अब कभी ख़ुद की बदकिस्मती पर रोती थी तो कभी अपनी दुर्दशा के लिए अपने माँ बाप को कोसती थी. अब न वो मुझसे चार्ली ऑन करने का अनुरोध करती थी और न ही किसी से अपना मन-पसंद टीवी चेनल लगाने को कहती थी. काम के बोझ के नीचे एक बच्ची की बेफ़िक्री, उसकी मस्ती, पता नहीं कब, सिसक-सिसक कर दम तोड़ चुकी थी.
गुड़िया की मम्मी ठीक होकर काम पर वापस आ गयी तो भी उसकी बेटी वो पुरानी वाली हमारी अल्हड़ गुड़िया नहीं रही. इस बीच रमा ने गुड़िया में एक और बदलाव महसूस किया था. गुड़िया अब बहुत बन संवर कर आने लगी थी. अब काम काज करने में उसका मन नहीं लगता था और अपनी मम्मी के टोकने पर वो उस से लड़ने भी लगी थी. रमा ने उसे ऐसा न करने के लिए प्यार से समझाया तो फफक फफक कर रोते हुए बोली –
‘आंटी, सात साल की उमर से झाड़ू-बर्तन कर रही हूँ. इस से तो अच्छा था कि मैं पैदा होते ही मर जाती.’
रमा ने गुड़िया को दो-तीन बार एक लड़के के साथ मोटर साइकिल पर भी देखा तो उसने उसे आने वाले खतरे से आगाह किया –
‘देख गुड़िया, इन लड़कों से तू दूर ही रह. तेरी मम्मी तो तेरे लिए एक अच्छा सा लड़का देख रही है. तू ऐसा-वैसा कुछ मत करना कि तुझे आगे लेने के देने पड़ जाएं.’
गुड़िया ने जवाब दिया –
‘आंटी, बिना पढी लिखी गुड़िया को तो ससुराल जाकर भी बर्तन ही तो मांजने हैं. इस से तो अच्छा है कि कुछ दिन तो मोटर साइकिल पर घूम लूं.’
और फिर वही हुआ जिसका कि रमा को अंदेशा था गुड़िया उस मोटर साइकिल वाले लड़के के साथ भाग गयी.
गुड़िया की मम्मी का रोना पीटना देख कर भी मुझे उसके प्रति कोई सहानुभूति नहीं हो रही थी, उल्टे मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था.
लानत है उन माँ बाप पर जो कि अपने बच्चों का बचपन कुचलकर अपनी हिस्से की जिम्मेदारियां उन पर थोप देते हैं.
गरीब गुड़िया की मम्मी अपने गहने बेचकर पुलिस और अदालत के चक्कर लगाती रही. लड़के पर इलज़ाम था कि उसने सोलह साल से भी कम उम्र की लड़की का अपहरण कर उस से ज़बर्दस्ती शादी की है जब कि लड़के वालों ने डॉक्टर को पैसे देकर झूठा सर्टिफिकेट हासिल कर लिया कि लड़की 18 साल से ऊपर की है. लड़की ने अदालत में बयान दे दिया कि उसने अपनी मर्ज़ी से उस लड़के से शादी की है.
अंत भला होता तो सब भला होता पर गुड़िया शादी के तीन महीने बाद ही दिहाड़ी मजदूर हो गयी. उसकी ससुराल तो उसके मायके से भी ज़्यादा गरीब थी. शादी के बाद गुड़िया एक बार हम से मिलने आई तो उसकी दुर्दशा देख कर रमा तो रो ही दी. उस प्यारी सी मस्त गुड़िया को इस हाल में देख कर मेरी भी आँखें भर आईं. खैर, मैंने माहौल को हल्का करने के लिए उस से पूछा -
गुड़िया क्या कम्यूटर पर तेरा चार्ली ऑन करूँ ?'
उदास गुड़िया ने मेरी बात का कोई जवाब देने के बजाय अपना सर झुका लिया.
जा गुड़िया ! मेरी भगवान से प्रार्थना है कि तू अपने पुराने कुएँ से निकल कर इस नई खाई में सुखी रहे, आबाद रहे. पर तुझसे हाथ जोड़ कर मेरी यह प्रार्थना है कि तू खुद कोई ऐसी गुड़िया मत पैदा करना जिसे अपने बचपन में ही झाड़ू-बर्तन करने या किसी बन रही इमारत पर दिहाड़ी करने के लिए जाना पड़े.

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

नयी सुबह



बाल कथा
नयी सुबह
अलका सात साल की,  सुन्दर सी,  नटखट पर जि़द्दी लड़की थी। अलका के पापा साइंटिस्ट थे,  रिसर्च के सिलसिले में पिछले तीन साल से वह लन्दन में थे। इन तीन सालों से अलका को पालने की जि़म्मेदारी सिर्फ़ उसकी मम्मी की थी। यूं तो उसकी मम्मी छुट्टियों में उसे लेकर कभी उसके दादाजी के यहाँ तो कभी उसके नानाजी के यहाँ रहने चली जाती थीं पर ज़्यादातर दोनों माँ-बेटी अकेले ही अपने घर में रहते थे। अलका की मम्मी उसे बहुत प्यार करती थीं। अलका के पापा विदेश में थे इसलिए उनके हिस्से का प्यार भी उसे अपनी माँ से ही मिलता था। माँ के ज़रूरत से ज़्यादा लाड-प्यार ने उसे अव्वल दर्जे की जि़द्दी और आलसी बना दिया था। बिस्तर पर लेटे-लेटे अलका रानी आवाज़ लगातीं तो मम्मी दौड़कर उनके सामने खड़ी हो जातीं और फ़ौरन उनके हुक्म के मुताबिक उनकी मनपसन्द चीज़ हाजि़र कर देतीं। सात साल की हो जाने पर भी अलका अपना कोई भी काम खुद नहीं करती थी। बस, ‘ मम्मी मुँह धोना है  कहो तो,  मम्मी टूथ-ब्रश और टूथ-पेस्ट लेकर हाजि़र,  मम्मी भूख लगी है कहो तो मम्मी उसकी पसन्द का खाना लेकर हाज़िर,   इतना ही नहीं वह उसे अपने हाथों से खाना खिला भी देती थीं। अक्सर अलका का होमवर्क भी उसकी मम्मी कर देती थीं। अलका का कोई दोस्त नहीं था। उसके साथ के बच्चे उसे पसन्द नहीं करते थे,  वो उसे मम्मी की पैट डॉल कह कर चिढ़ाते थे । अलका भी अपनी उम्र के बच्चों के साथ बैडमिन्टन, क्रिकेट या आइस-पाइस खेलने की जगह अपनी मम्मी के साथ कैरम,  वीडियो गेम्स खेलना या टीवी देखना ही पसन्द करती थी।
                अलका बहुत खुश थी क्योंकि लन्दन से आज उसके पापा वापस भारत आ रहे थे। तीन साल से उसने अपने पापा को सिर्फ़ फ़ोटोग्राफ़्स में देखा था या फ़ोन पर उनसे बात की थी। अलका जानती थी कि उसके पापा उसे बहुत प्यार करते हैं। लन्दन से आए दिन वह उसके लिए गिफ़्ट्स भेजते रहते थे और बहुत प्यारे-प्यारे लैटर्स भी। एअरपोर्ट पर पापा को प्लेन से उतरते देखकर वह उड़कर उनके पास पहुँचना चाहती थी पर उसे उनके आने का इन्तज़ार करना पड़ा। पापा ने देखते ही उसे गोदी में उठा लिया पर कुछ देर बाद ही उन्होंने उसे उसका गिफ्ट देकर गोदी से उतार दिया और लगे मम्मी से बातें करने। उन्हें तो अलका की उंगली पकड़ कर चलने का भी खयाल नहीं आया। आज मम्मी भी अलका की तरफ़ ध्यान देने की जगह बस,  पापा से ही बातें किए जा रही थीं।
                सब लोग घर पहुँचे। घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था,  ऐसी डैकोरेशन तो उसके बर्थ-डे पर भी नहीं की गई थी। डिनर का टाइम हो गया था। डायनिंग-टेबिल पर तरह-तरह के पकवान सजे थे, पापा की सभी फ़ेवरिट डिशेज़ थीं पर उसकी पसन्द की एक भी डिश नहीं थी। मम्मी ने आज तीन प्लेट्स लगाई थीं। एक पापा की,  एक अपनी और एक अलका की। अलका ने अलग प्लेट में कभी खाना खाया ही नहीं था। वह मम्मी की प्लेट में ही खाती थी वह भी उन्हीं के हाथ से।  मम्मी-पापा मज़े ले-ले कर खा रहे थे पर अलका ने खाने को हाथ भी नहीं लगाया था। मम्मी ने सिर झुकाए बैठी उदास अलका की परेशानी समझ ली थी पर जानकर भी वह अनजान बनी हुई थीं उधर पापा उससे पूछ रहे थे-
बेटे! क्या तबियत खराब है ? तुम खाना क्यों नहीं खा रही हो?“
अलका पापा को क्या जवाब देती? न पिज़ा,  न चाउमीन,  न सैण्डविचेज़ और न ही आइसक्रीम,  खाने के लिए बस थे-  कढी-चावल,  मक्के की रोटी,  सरसों का साग,  बाजरे के लड्डू और स्टुपिड रबड़ी। ऊपर से इस कबाड़ को खुद अपने हाथों खाना था। पापा को बिना जवाब दिए अलका चुपचाप सोने चली गई।
पापा के आते ही अलका को अलग कमरे में सुला दिया गया। उसे पापा के आने का कबसे इन्तज़ार था पर जब वह आ गए तो उसे सब कुछ खराब-खराब ही लग रहा था। सुबह मम्मी ने उसे खुद पेस्ट करने के लिए कह दिया। स्कूल जाने के लिए उसे ड्रेस तो दी गई पर उसे पहनना खुद ही पड़ा। अलका स्कूल से लौटी तो उसके साथ कैरम खेलने या टीवी देखने का समय भी मम्मी के पास नहीं था। अलका के हाथ में लूडो का बोर्ड देखकर उसके पापा उससे पूछ रहे थे –
अलका क्या तुम्हारे फ्रेन्ड्स नहीं हैं?  तुम्हें उनके साथ जाकर आउटडोर गेम्स खेलने चाहिए।
अलका को मम्मी पर बहुत गुस्सा आ रहा था,  वह अब उसका कोई काम ही नहीं कर रही थीं और पापा तो उसकी सारी परेशानियों की जड़ थे। जब से आए थे उसे और मम्मी को उपदेश ही दिए जा रहे थे। उन्होंने आते ही उसे मम्मी के कमरे से हटा दिया था। न्यूट्रशस फ़ूड के बहाने उसकी मनपसन्द डिशेज़ बनवाना बन्द करा दी थीं। सुबह उसे बहुत जल्दी उठना पड़ रहा था। उसे खुद अपने हाथों से खाना खाने के लिए कम्पेल किया जा रहा था। उसे अपने सारे काम खुद करने पड़ रहे थे और अब मम्मी से दूर रखने के लिए ज़बर्दस्ती उसे दोस्तों के पास खेलने के लिए भेजा जा रहा था। पापा के आने के अगली रात अलका अपने अलग कमरे में सोने से पहले भगवान से प्रार्थना कर रही थी-
हे भगवान! पापा को रिसर्च के काम से फिर बाहर भेज दो।
अगले दिन सन्डे था,  अलका देर तक सोना चाहती थी पर बड़े सवेरे ही पापा ने उसे जगा दिया। उसके लाख मना करने पर भी वह ज़बर्दस्ती उसे अपने साथ मोर्निंग वाक पर ले गए। अलका का मूड बहुत खराब था,  कितनी अच्छी नींद आ रही थी,  अब चलते-चलते अपनी टाँगे तोड़ो। पर यह क्या! यह गोल-गोल ऊपर उठता हुआ चमकता हुआ सोने का थाल क्या है?  वाह कितना खूबसूरत सीन है! पापा से नाराज़ होते हुए भी उसने उसके बारे में पूछ लिया। पापा ने हँस कर जवाब दिया-
बिटिया रानी इसे सूरज कहते हैं। आप जो सीन देख रही हैं वह सनराइज़ है।
अलका को बड़ी शर्म आई। वह कभी सुबह जल्दी उठी ही नहीं थी,  सनराइज़ कहाँ से देखती। पार्क में टहलते हुए चह-चहाती चिडि़याएं देखकर भी अलका को बहुत अच्छा लगा। एक जगह उसने देखा कि एक बड़ी चिडि़या अपने बच्चे को चोंच से बार-बार मार रही है। अलका ने फिर पापा से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया-
ये चिडि़या अपने बच्चे को उड़ना सिखा रही है। जब तक यह अपने बच्चे को खुद से अलग नहीं करेगी तब तक वह उसे उड़ना नहीं सिखा पाएगी। कुछ दिन बाद तुम देखना यह चिडि़या का बच्चा उड़ना भी सीख जाएगा और अपने लिए खाना भी खुद ही खोजना शुरू कर देगा।
अलका को मोर्निंग वाक अब बहुत अच्छा लग रहा था। वह पापा से एक के बाद एक सवाल पूछ रही थी और पापा उसके हर सवाल का जवाब दे रहे थे। उसे यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि जानवरों और पंछियों के बच्चे बहुत जल्दी अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं। अलका ने सुबह-सुबह छोटे-छोटे बच्चों को काम करते हुए देखा। बिना किसी से पूछे अलका को पता चल गया कि इंसानों में भी बहुत कम बच्चे उसकी तरह आलसी होते हैं।
आज अलका को किसी काम के लिए भी मम्मी की मदद लेना अच्छा नहीं लगा। तीसरे पहर मम्मी उसके साथ ताश खेलना चाहती थीं पर वह अपने दोस्तों के साथ बैडमिन्टन खेलने चली गई। डिनर पर अलका ने पिज़ा छोड़कर पापा की ही तरह दही,  सब्ज़ी के साथ रोटी खाई,  फिर बिना मम्मी की मदद के अपना होमवर्क कर वह अपने कमरे में सोने चली गई पर सोने ने पहले वह भगवान से प्रार्थना करना नहीं भूली-
हे भगवान! मेरे अच्छे पापा को हमेशा मेरे पास रखना और मुझे अपना काम खुद करने का वरदान देना।
अलका की मम्मी उसमें बदलाव देखकर बहुत परेशान थीं। उन्होंने अलका के पापा से कहा-
अलका बहुत बदली-बदली सी लग रही है। मेरी मदद के बिना वह अपने सारे काम कर रही है,  कहीं वह इतना स्ट्रेन करके बीमार नहीं पड़ जाएगी?
अलका के पापा ने कहा-तुमने अपने लाड-प्यार से बच्ची को बीमार बना दिया था। अब वह खुद को ठीक करने की कोशिश कर रही है।
अलका की मम्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी,  उन्हें लग रहा था कि अलका के पापा उसके साथ कुछ ज़्यादा ही सख्ती कर रहे हैं। यही सोचते-सोचते उन्हें नींद आ गई।
सुबह बड़े सवेरे अलका की मम्मी को किसी ने जगाया। उन्होंने सोचा कि अलका के पापा होंगे पर नहीं, यह तो अलका थी जो कि अपनी मम्मी-पापा के लिए बैड-टी लेकर खड़ी मुस्कुरा रही थी। अलका का यह नया रूप देखकर मम्मी की आँखों में आँसू आ गए पर पापा प्यार से हँस रहे थे। यह सुबह देखने में और सुबहों की तरह ही थी पर अलका के लिए यह आशा की नयी सुबह थी जो उसे खुले आकाश में खुद उड़ना सिखा रही थी।

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

कवि से मेरा प्रश्न

सिसक-सिसक गेंहू कहें,
फफक-फफक कर धान,
खेतों में फ़सलें नहीं,
उगने लगे मकान.
(कुंवर बेचैन)

कवि से मेरा प्रश्न -

खेतों में उगते मकान, क्यों आप दुखी हैं,
देश प्रगति कर रहा, देख, नृप बड़े सुखी हैं.
फ़सलों का रोना क्यूं रोएँ, उस महफ़िल में,
जहाँ छलकते जाम, थिरकती, चन्द्रमुखी हैं.

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

फिर से बदलो मुन्ना भाई




फिर से बदलो मुन्ना भाई -
सच का दामन जब से थामा,
मुन्ना पानी भरता है.
जिसका खौफ़ ज़माने को था,
साए से भी डरता है.
मेहनत कर के भी मुफ़लिस है,
निस-दिन फाके करता है.
हसरत लिए मकानों की पर,
किसी सड़क पर मरता है.
गांधीगिरी छोड़ कर मुन्ना,
बेक़सूर को मारेगा.
श्राद्ध, अहिंसा का कर के वो,
अपना कुनबा तारेगा.
क्या अफ़सर, क्या नेता-मंत्री
उसके पीछे भागेगा.
दुःख की बदली छट जाएगी,
भाग्य-सूर्य फिर जागेगा.

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

टाइपराइटर

टाइपराइटर -
गवर्नमेंट इंटर कॉलेज रायबरेली में क्लास 8 में पढ़ते हुए मैंने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा आयोजित हाईस्कूल मेरिट स्कॉलरशिप के लिए एक परीक्षा में भाग लिया था और उसमें मैं सफल भी हुआ था. अब मुझे क्लास 9 तथा क्लास 10 में 10 रूपये महीने का स्कालरशिप मिलना था. लेकिन मैंने जैसे ही क्लास 9 उत्तीर्ण किया, पिताजी का तबादला बाराबंकी हो गया. क्लास 9 में स्कॉलरशिप के 120 रूपये मुझे रायबरेली में मिल भी गए थे. क्लास 10 के लिए अब मेरा प्रवेश गवर्नमेंट इंटर कॉलेज बाराबंकी में करा दिया गया.
मुझे अपने स्कॉलरशिप के बकाया 120 रूपये की बहुत चिंता थी. ये उस ज़माने की बात है जब मेरा मासिक जेब-खर्च 2 रूपये हुआ करता था. स्कॉलरशिप की बकाया रकम मुझे बाराबंकी में मिलनी थी. आखिर रायबरेली और बाराबंकी दोनों ही उत्तर प्रदेश में आते हैं.
मैंने कॉलेज के ऑफिस में पता किया तो मुझे बताया गया कि हाईस्कूल मेरिट स्कॉलरशिप की अगली किश्त आ चुकी है. हमारे बाराबंकी के कॉलेज में इस स्कॉलरशिप को बड़े बाबू श्री – (अब उनका नाम लालची बड़े बाबू ही मान लीजिए) डील करते थे मैंने आवश्यक दस्तावेज़ पहले ही ऑफिस में जमा कर दिए थे. बड़े बाबू ने कागज़ात लेते समय मुझे बहुत कस के घूरा था जिसका कारण उस समय मेरे समझ में नहीं आया था. बाद में मित्रों ने बताया कि लालची बड़े बाबू खर्चा पानी लिए बिना तो अपने बाप का काम भी नहीं करते. लेकिन मैं दूसरी मिट्टी का बना था. पैसे देकर अपना वाजिब काम कराना मेरे उसूलों के खिलाफ़ था और मैं समझता था कि ऐसे हर बेईमान को मेरे पिताजी अपनी अदालत में कड़ी से कड़ी सज़ा दे सकते हैं.
लालची बड़े बाबू के पास जब भी मैं स्कॉलरशिप के बारे में पता करने जाता तो वो घुड़क कर मुझे भगा देते थे. इन 120 रुपयों के पीछे कम से कम 10-12 बार तो मैंने झिड़की, घुड़की, डांट-फटकार आदि तो खाई ही होगी पर अब पानी सर से ऊपर निकल गया था. मैंने अब अपने ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने का निश्चय किया और लालची बड़े बाबू की शिकायत पिताजी से कर दी.
मैं कल्पना कर ही रहा था कि पिताजी लालची बड़े बाबू को कठोर दंड सुनाने के साथ मेरा बकाया स्कॉलरशिप दिलाने का आदेश पारित कर देंगे पर ये क्या हुआ? पिताजी बेरुखी से बोले –
‘अपने कॉलेज की बात मुझसे क्यों कर रहे हो? बड़ा बाबू बेईमान है तो उसकी शिकायत अपने प्रिंसिपल से करो.’
अब मैं पिताजी को कैसे बताता कि प्रिंसिपल साहब से बड़े बाबू की शिकायत कर पाना मेरे लिए असंभव था.
लालची बड़े बाबू को पता था कि मेरे पिताजी जुडिशियल मजिस्ट्रेट हैं पर वो इस से बिलकुल भी रौब में नहीं आए और बिना दस्तूरी लिए मेरा काम करने को क़तई तैयार नहीं थे. अब मैंने खुद ही न्यायाधीश बनने का फ़ैसला कर लिया.
पिताजी के पास रेमिंगटन का पोर्टेबल टाइपराइटर था अपने जजमेंट की सीक्रेसी मेन्टेन करने के लिए पिताजी खुद ही उन्हें अपने टाइपराइटर पर टाइप करते थे. हम बच्चे भी उनकी अनुमति से और उनके निर्देशन में उनके टाइपराइटर पर टाइपिंग में पारंगत होते रहते थे. खैर टाइपिंग तो मुझे क्या आई पर एक ऊँगली से लेटर टाइप करना तो आ ही गया था.
‘A quick brown fox jumps over the lazy dog’
इस छोटे से वाक्य में 'ए' से लेकर ‘ज़ेड’ तक के सभी अक्षर आ जाते हैं और मैं इतना टाइप करना तो जान ही गया था.
मेरा अंग्रेज़ी ज्ञान किसी बर्नार्ड शॉ से कम नहीं था. लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी के एम. ए. मेरे पिताजी और अंग्रेज़ी में महा-निष्णात मेरे बड़े भाई साहब भी मुझे अंग्रेज़ी का पंडित नहीं बना सके थे. अंग्रेज़ी से हिंदी करना तो मुझे आता था पर अंग्रेज़ी में कुछ भी लिखने के लिए उसको कंठस्थ करना बड़ा ज़रुरी होता था. अब चाहे वो एप्लीकेशन हो, चाहे कम्प्लेन हो, चाहे एसे हो.
अब मैंने पिताजी की ओर से लालची बड़े बाबू के खिलाफ़ एक कम्प्लेन लिखने का निश्चय किया. टाइप राइटर ज़िन्दाबाद! अब टाइपराइटर पर टाइप की हुई मेरी शिकायत में तो मेरी बचकानी राइटिंग भी छुप जानी थी. मुझे लीव एप्लीकेशन लिखना आता था. उसी पैटर्न पर मैंने पिताजी की ओर से प्रिंसिपल साहब को कम्प्लेन टाइप कर दी.
मुझे पता था कि पिताजी को अगर मेरी गुस्ताखी का पता चल गया तो दो-चार जन्म तो वो लगातार मुझको फांसी की सज़ा दिलवा ही देंगे पर उन्हें पता चलना ही कहाँ था?
मैंने कम्प्लेन टाइप की –
To
The Principal,
Government Inter College,
Barabanki.
Sir,
With due respect, I beg to say that the Head Clerk of your office Shri --- is very dishonest. He is is not releasing the second instalment of the High School Merit Scholarship of my son Gopesh Mohan Jaswal, a student of Class Xth.
Kindly do the needful and punish the culprit.
With regards,
Yours faithfully,
A. P, Jaswal
Dated : ---
शिकायत पत्र को और भी अधिक प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने पिताजी के सिर्फ़ हस्ताक्षर ही नहीं बनाए बल्कि उनकी सरकारी मुहर भी उस पर लगा दी.
मुझे पता था कि लालची बड़े बाबू भी मेरी तरह अंग्रेज़ी में पैदल हैं. मैं बड़े रौब से बड़े बाबू के पास पहुंचा और बहुत आत्मविश्वास से उन से बोला –
‘बड़े बाबू ! पिताजी ने आपके खिलाफ़ प्रिंसिपल साहब को यह शिकायत भेजी है पर उन्होंने कहा है कि इसे तुम पहले बड़े बाबू को दिखाओ, अगर वो तुम्हारे स्कॉलरशिप के पैसे तुम्हें फिर भी नहीं दें तो फिर तुम इसे अपने प्रिंसिपल साहब को दे देना.
बड़े बाबू ने घूरते हुए वो कागज़ मुझसे ले लिया. बहुत देर तक वो उसे रुक-रुक कर हक्ला-हक्ला कर पढ़ते रहे. पहले उनका चेहरा पीला हुआ फिर उनके कान लाल हुए फिर उन्होंने कुछ देर अपनी आँखें बंद कर लीं फिर एक दम से ममता की मूर्ति बनकर बोले -
‘अरे बेटा गोपेश ! तुमने अपने पिताजी को नाहक तकलीफ़ दी. तुम्हारे स्कॉलरशिप के पैसे तो परसों ही आ गए थे. मैं तो चपरासी भेजकर तुमको बुलवाने ही वाला था.’
बड़े बाबू ने मेरी रकम मुझे सौंपी और रसीद में रेवेन्यू स्टाम्प भी अपनी ओर से लगा दी.
मैंने शिकायत वाला पत्र उनके सामने ही नष्ट कर दिया.
अंत भला तो सब भला. पर कहना होगा कि सत्य की नहीं बल्कि असत्य की जय हुई.
पिताजी को कभी मैंने अपनी इस गुस्ताखी के बारे में नहीं बताया पर अब लगता है कि पिताजी स्वर्ग में बैठे मेरी इस बदमाशी के विषय जानकर हंस रहे होंगे और लालची बड़े बाबू आज जहाँ भी होंगे, वहां उस घटना को याद करते हुए,  अपने दांत पीस रहे होंगे.

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सोमवार, 25 सितंबर 2017

शानदार भाषण

शानदार भाषण -
124 साल पहले शिकागो में आयोजित विश्व धर्म-सम्मलेन में एक अनजान भारतीय सन्यासी, स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण से सारी दुनिया पर भारतीय आध्यात्म की समृद्धि की गहरी छाप छोड़ी थी. दुनिया के तमाम गोरे, काले, पीले, उनके और भारतीय आध्यात्म के मुरीद हो गए थे. इस भाषण ने हम गुलाम भारतीयों के आहत अभिमान पर मरहम का काम किया था. इस भाषण ने हम भारतीयों में आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास का संचार किया था पर इस ऐतिहासिक भाषण से हमारे देश को एक बहुत बड़ा नुकसान भी हुआ है और वह यह है कि इस के बाद से हमारे देश में भाषण फोड़ना और अपनी लफ्फाज़ी से जनता को गुमराह करना एक व्यवसाय बन गया है.
आज अच्छे वक्ता की बड़ी क़द्र है. फ़िल्मों में अच्छे संवाद हों तो मज़ा आ जाता है. फ़िल्म मुगले आज़म के लम्बे-लम्बे भाषण हम आज भी याद करते हैं, भले ही उनकी क्लिष्ट उर्दू हमारे क़तई पल्ले न पड़ती हो.
फिर ज़माना आया फ़िल्म ‘शोले’ का, उसके वन लाइनर डायलौग्स का. - ‘तुम्हारा नाम क्या है बसंती?’, ‘तेरा क्या होगा कालिया?’, ‘ये हाथ हमको दे दे ठाकुर’, ‘बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना.’
कोई भी वित्तमंत्री जब बजट पेश करते हैं तो उसमें दो-चार शेर ज़रूर पढ़े जाते हैं अगर इनकम टैक्स की दर बढ़ाई जाती है तो मिर्ज़ा ग़ालिब का शेर पढ़ा जाता है. अगर सेल्स टैक्स बढ़ाया जाता है तो जिगर मुरादाबादी का. और अगर घाटे को कम करने में नाकामी स्वीकार की जाती है तो बशीर बद्र का यह शेर पढ़ दिया जाता है –
‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता.’
नेहरु जी के चहेते कृष्णा मेनन थे, बहुत अच्छा भाषण फोड़ते थे. यू एन ओ में पाकिस्तान के खिलाफ़ इतने अच्छे और ओजस्वी भाषण देते थे कि क्या कहा जाय. एक बार तो वो भाषण देते-देते बेहोश भी हो गए थे. बाद में कृष्णा मेनन हमारे रक्षा मंत्री बना दिए गए पर जब चीन ने 1962 में हमको पटकनी दी तो हमारे रक्षा मंत्री जी की भाषण कला हमारे किसी काम नहीं आई.
आजकल फिर भाषण कला के महत्त्व को पुनर्स्थापित किया जा रहा है. हमारे प्रधान मंत्री देश- विदेश में जहाँ भी भाषण देते हैं तो उनकी जय-जयकार होती है. उनके भाषण की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जाते हैं और साथ में यह भी जोड़ दिया जाता है कि पित्ज़ा मम्मी को तो हिंदी बोलना भी नहीं आता और पप्पू तो हमेशा बचकानी बात करता है.
अभी यू. एन. में हमारी युवा अधिकारी ईनम गंभीर ने पाकिस्तान को टेररिस्तान कह दिया. वाह ! क्या खूब कहा ! पाकिस्तान तो पानी पानी हो गया. पर इस से क्या पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों की संख्या घट जाएगी? क्या अमेरिका तथा अन्य पाश्चात्य देश आतंकवाद के गढ़ पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देना बंद कर देंगे?
और अगर ऐसा नहीं होगा तो ईनम गंभीर के भाषण को हम इतनी गंभीरता से क्यों ले रहे हैं?
इस से तो अच्छा है कि हम पी वी सिन्धु की जीत पर खुशियाँ मनाएं, कुलदीप यादव की हैट ट्रिक या हार्दिक पांड्या के छक्कों का जश्न मनाएं, या थिएटर में जाकर फ़िल्म ‘न्यूटन’ देख आएं.
आइए अब असली मुद्दे पर आएं.
23 सितम्बर 2017 को हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यू. एन. ओ. की जनरल असेंबली के 72 वें अधिवेशन में शानदार भाषण दिया. प्रधानमंत्री ने उनके भाषण की भूरि भूरि प्रशंसा की पर कांग्रेसी नेता इस से जल मरे.
इस भाषण में सुषमा जी ने 2030 तक की महत्वकांक्षी भारतीय योजनायें प्रस्तुत कर दीं.
अब जलवायु परिवर्तन, निरस्त्रीकरण, ‘सेव दि गर्ल’, ‘एजुकेट दि गर्ल’, वाली बातें तो दुनिया भर के पल्ले पड़ी होंगी पर जन-धन योजना, उज्जवला योजना, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, क्लीन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया वगैरा से दुनिया को क्या लेना देना? क्या सुषमाजी का इरादा 2019 के चुनाव में दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों के वोट लेने का भी है?
सुषमा जी ने भारत और पाकिस्तान की तुलना करते हुए बताया –
‘हमने विद्वान, इंजीनियर और डॉक्टर उत्पन्न किए जब कि पाकिस्तान ने आतंकवादी पैदा किए हैं.'
अब इस पर ताली बजाना तो बनता है. अब ऐसी बात पहली बार तो कही नहीं गयी है और ऐसी बातों से पाकिस्तान अपनी हरक़तों से बाज़ भी नहीं आएगा, हमको तो किसी चमत्कार की कोई सम्भावना भी नज़र नहीं आती. क्या इस से पाकिस्तान पर दबाव पड़ेगा कि वह आतंकवाद को पनाह न दे, या कश्मीर भारत को सौंप दे, और ऐसा कुछ नहीं होने वाला तो हम इस नूरा कुश्ती को इतना ज़्यादा महत्त्व क्यों दे रहे हैं?
सुषमा जी को बधाई ! वो अंतर्राष्टीय मंच पर भारत का पक्ष रखने में सफल रहीं पर इस भाषण में उनका मुख्य उद्देश्य तो मोदी जी को 2019 का चुनाव जिताना लग रहा है.
भाषण तो मैं भी अच्छे फोड़ लेता हूँ, शेरो-शायरी करना भी थोड़ा-बहुत आता है, मकबूल शायरों के कुछ फड़कते हुए अशआर भी सुना सकता हूँ. पर मेरे भाषणों में इतनी ताक़त भी नहीं कि उसके बल पर मेरी अदना सी कार एक किलोमीटर भी चल सके. मोदी जी और सुषमा जी तो अपने भाषणों के बल पर पूरे हिंदुस्तान को ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया को चलाना चाहते हैं.
मेरी समस्त देशवासियों से करबद्ध प्रार्थना है कि वो किसी भाषण को इतना महत्त्व न दें कि अपने सारे काम भुलाकर सिर्फ़ जश्न मनाने में लग जाएं. फैज़ अहमद फैज़ की तर्ज़ पर मैं कहूँगा –
‘और भी गम हैं ज़माने में, तेरे भाषण के सिवा,
काम कुछ और भी हैं, ताली बजाने के सिवा.

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हिंदी दिवस की पूर्व-संध्या पर



हिंदी दिवस

कितनी नक़ल करेंगे, कितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ की, जीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों का, दामन वो थाम लेंगे,  
हिंदी दिवस पे ही बस, हिंदी का नाम लेंगे.

जिसे स्कूल, दफ्तर से, अदालत से, निकाला था,
उसी हिंदी को अब, घर से औ दिल से निकाला है.
तरक्क़ी की खुली राहें, मिली अब कामयाबी भी,  
बड़ी मेहनत से खुद को, सांचा-ए-इंग्लिश में ढाला है.    

सूर की राधा दुखी,  तुलसी की सीता रो रही है,
शोर डिस्को का मचा है,  किन्तु मीरा सो रही है.
सभ्यता पश्चिम की,  विष के बीज कैसे बो रही है,
आज अपने देश में, हिन्दी प्रतिष्ठा खो रही है.

आज मां अपने ही बेटों में,  अपरिचित हो रही है,
बोझ इस अपमान का,  किस शाप से वह ढो रही है.
सिर्फ़ इंग्लिश के सहारे, भाग्य बनता है यहां,
देश तो आज़ाद है,  फिर क्यूं ग़ुलामी हो रही है.